31.3.04

मॉड्युलर इन्फ़ोटेक की श्री मुद्रलिपि

शक्लोसूरत अच्छी है। हाँ, संयुक्ताक्षर इसमें संस्कृत 2003 से कम हैं। इसे मिला कर कुल मुद्रलिपियों का सङ्ख्या दस हो गई है। श्री मुद्रलिपि

24.3.04

डायमण्ड पब्लिकेशंस

क्रिकेट टुडे, गृहलक्ष्मी, साधना पथ - जल्द ही आ रहे हैं। यार ये वही डायमण्ड कॉमिक्स वाले हैं क्या? तो फिर कुछ अदद कॉमिक्स भी पेश की जाएँ!

18.3.04

आपकी सेवा में, अब दो तरह से

लिनक्स वाले स्थल तो बहुत अनुवादित किए, अपने चिट्ठे भी बनाए। पर कुछ जालस्थल जो मुक्त नहीं हैं, वे कैसे हिन्दी में आएँगे? तो प्रस्तुत है यह सेवा। यदि आप किसी को जानते हैं जो कि अपने स्थल अनुवादित करवाने में दिलचस्पी रखते हैं, तो ज़रूर लिखें। हाँ स्वयंसेवी कार्य तो अलग चलता ही रहेगा, फ़िलहाल मेरी नज़र है लाइव्जर्नल के हिन्दी अनुवाद पर, कोई और शामिल होना चाहे तो काम में दिलचस्पी बढ़ेगी। इसके लिए लाइव्जर्नल के ब्रॅड को डाक भेजनी होगी। तो यदि आप की दिलचस्पी अब भी हो तो ज़रूर लिखें।

17.3.04

लौ सुनो चियापसल रेडियो

नेपाली व अङ्ग्रेज़ी में बना एक चिट्ठा। समझ तो ज़्यादा नहीं आया, लेकिन स्थल की रचना बहुत ही आकर्षक है। क्यों न हिन्दी का भी ऐसा ही सामूहिक चिट्ठा बनाया जाए?

हाथ कङ्गन को आरसी क्या

पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या। यह कहावत कम से कम इन लोगों पर तो सही बैठती है।

15.3.04

ख़्वाबों का भरम टूट गया

अपने बिस्तर में बहुत देर से मैं नीम दराज़ सोचती थी कि वह इस वक़्त कहाँ पर होगा मैं यहाँ हूँ मग़र उस कोचा ए रङ्गो बो में रोज़ की तरह वह आज भी आया होगा और जब उसने वहाँ मुझ को न पाया होगा? आपको इल्म है वो आज नहीं आई हैं? मेरी हर दोस्त से उसने यही पूछा होगा क्यों नहीं आई वो क्या बात हुई आखिर खुद से इस बात पे सौ बार वो उलझा होगा कल वो आएगी तो मैं उससे नहीं बोलूँगा आप ही आप कई बार वह रोता होगा वो नहीं है तो बुलन्दी का सफ़र कितना कठिन सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने यह सोचा होगा राहदारी में, हरे लॉन में, फूलों के करीब उसने हर सिम्ट मुझे आँख ढूँढा होगा नाम भूले से जो मेरा कहीं आया होगा गैर महसूस तरीके से वह चौंका होगा एक ही गुमले को कई बार सुनाया होगा बात करते हुए सौ बार वह भूला होगा यह जो लड़की नई आई है, कहीं वह तो नहीं उसने अर चेहरा यही सोच के देखा होगा जाने महफ़िल है, मगर आज फ़कत मेरे बगैर हाय! किस दर्जा वह बज़्म में तन्हा होगा कभी सनताओं से वहशत जो हुई होगी उसे उसने बे सकता फिर मुझ को पुकारा होगा चलते चलते कोई मनूस से आहट पाकर दोस्तों को भी किसी उज़्र से रोको होगा याद कर के मुझे नम हो गईं होंगी पलकें "आँख में कुछ पड़ गया" कह के टाला होगा और घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाह हर सतर में मेरा चेहरा उभर आया होगा जम मिली को उसे मेरी अलालत की ख़बर उसने आहिस्ता से दीवार को थामा होगा सोच कर ये, कि बेहाल जाए परेशाने दिल यूँही बेवजह किसी शख्स को रोका होगा! इत्तिफ़ाक़न मुझे उस शाम मेरी दोस्त मिली मैंने पूछा कि सुनो आए थे वह? कैसे थे? मुझ को पूछा था? मुझे ढूँढा था चारों जनब? उसने एक लम्हे को मुझे देखा और फिर हँस दी उस हँसी में तो वह तल्खी थी कि उस से आगे क्या कहा उसने मुझे याद नहीं है; लेकिन इतना मालूम है कि ख़्वाबों का भरम टूट गया। - कराची की एक डाक सूची से

World/Hindi/संगणक/अन्तर्जाल/जाल_पर/चिट्ठे

ज़ाहिर है कि आप अपने चिट्ठे के बारे में क्या सोचते हैं, और दूसरे उसके बारे में क्या सोचते हैं, उसमें कुछ तो फ़र्क होगा। आप चाहें तो अपनी प्रविष्टि के विवरण या शीर्षक में परिवर्तन का अनुरोध कर सकते हैं, या फिर नए स्थल प्रस्तावित कर सकते हैं। इतना ही नहीं आप चाहें तो सम्पादक भी बन सकते हैं। सारे निर्णय सम्पादकों का दल लेता है, सभी सम्पादक स्वयंसेवी हैं।

11.3.04

प्रभासाक्षी हुआ यूनिकोडित

यह अखबार कुछ समय पहले कृतिदेव मुद्रलिपि में हुआ करता था। अब यूनिकोडित है। बढ़िया है।

10.3.04

टी टी ऍफ़ का मसला कैसे देखें?

मैं यह देखना चाहता हूँ कि टीटीऍफ़ मुद्रलिपि में 0 से 255, हरेक स्थिति पर कौन सा आकार यानी ग्लिफ़ स्थित है। आसान तरीका क्या है? विण्डोज़ या लिनक्स, कहीं पर भी चलेगा।

4.3.04

मनीला

क्या आप में से कोई इस जगह के बारे में जानता है? सम्भव है कि मुझे कुछ समय यहाँ रहना पड़े। एक शाकाहारी भारतीय युगल की दृष्टि से कैसी जगह है यह?