29.11.05

खोजा वारिस, मिली झाँसी की रानी

वारिस की खोज करते हुए मिल गईं झाँसी की रानी। बड़े दिनों बाद मिली। याद है मुझे, मैंने पूरी कविता घोटी थी। काफ़ी लम्बी चौड़ी है। बाद में पता चला कि यह कविता और जगह भी है। लेकिन ओल्ड पोएट्री में केवल हिन्दी की कविताएँ खोजने की सुविधा या वर्गीकरण नहीं मिला। पहली बार जब झाँसी गया था - लखनऊ से मद्रास जाना था, तो झाँसी से गाड़ी बदली थी। तो झाँसी में कुछ छः घण्टे का समय था। सोचा था कि किला देखूँगा, लेकिन घुस गया थियेटर में, और देख डाली बॉम्बे। किला अब तक नहीं देखा है, दस साल हो गए।

25.11.05

तिरुक्कुरळ

करैकुडि के ऍमजी व्यङ्कटकृष्णन ने 1966 में इनका तमिळ से अनुवाद किया था। बहुत से अध्याय हैं। धर्म काण्ड, अर्थ काण्ड और काम काण्ड। लेकिन इसके बजाय यदि आप झारखण्ड से निर्दलीय चुनाव लड़ने वालों के नाम जानना चाहते हों तो वो भी मिल जाएँगे। अरे बड़ा धाँसू स्थल बनाया है चुनाव आयोग वालों ने। काम इसपे सीऍमसी ने किया है जिसका मालिक अब टीसीऍस है। कौन कहता है आईटी कम्पनियाँ हिन्दुस्तान के लिए कुछ करती नहीं हैं? नोट बिछाओ, तो सब कुछ करने को तैयार हैं। और चुनाव के बाद राजस्थान विधान सभा के सूचीबद्ध प्रश्नों का जायका भी ले लिया जाए।

23.11.05

मात्राओं की ग़लतियाँ

पहले भी लिखा था, और अब फिर लिख रहा हूँ, कि मात्राओं की ग़लतियाँ यदि हैं तो उसका निदान भी है। दिक्कत लिखने में नहीं है, लिखे के प्रदर्शन में है, और उसे ठीक करना काफ़ी सरल है। मसलन, ये प्रविष्टि आपको ऐसी दिखनी चाहिए: मात्रा यदि नहीं दिख रही हो तो यहाँ जाएँ:
त्रुटि इस बीच चिट्ठों के बारे में एक अच्छा नज़रिया मिला - वागर्थ के इस लेख से, और कुछ (कम से कम मेरे लिए तो) नए काव्यात्मक चिट्ठे मिले - सुरभित रचना, और ख़ुशबू

खुली निर्देशिका के बारे में कुछ खुलासा

नेट्स्केप की खुली निर्देशिका, जो कि गूगल की निर्देशिका बन जाती है, बल्कि इतना ही नहीं, कोई भी इसका आर डी ऍफ़ डम्प ले के कुछ शर्तों के अन्तर्गत काम में ला सकता है। आप ये भी देखेंगे कि गूगल के खोज परिणामों में स्थलों के वर्णन सीधे इसी निर्देशिका से टीपे होते हैं, यदि ये स्थल निर्देशिका में हों तो। इस निर्देशिका को सम्पादकों की आवश्यकता हमेशा रहती है - जो कि फ़ोकट में काम करते हैं, और जाल पर अच्छे स्थलों को प्रोत्साहन देने में दिलचस्पी रखते हों, केवल अपने स्थल का प्रचार और प्रसार में ही दिलचस्पी रखने वाले लोगों का यहाँ स्वागत नहीं होता है। हिन्दी में इसके तीन विभाग हैं - मुख्य हिन्दी विभाग, शिशुओं व किशोरों के लिए (ये अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है), तथा केवल वयस्कों के लिए। अब ये ज़िम्मेदारी का काम है, क्योंकि यहाँ जो स्थल जाते हैं, पूरी दुनिया को उनके बारे में ज़्यादा जल्दी पता चलता है। तो आपका भी स्वागत है इस सफ़र में। किसी भी वर्ग के पृष्ठ में ऊपर स्थित "पता जोड़ें" अथवा "सम्पादक बनें" पर चटका लगाएँ। अपनी निर्देशिका बनाने के बजाय इसमें जोड़ने का लाभ ये है कि इसकी पहुँच बहुत है, आप रहें न रहें आपका काम आपके बाद भी रहेगा, और आपका नाम तो होगा ही।

17.11.05

सूवा से रेड्मण्ड तक

पिछले दो दिनों में http://devanaagarii.net पर एक नॉर्थ शोरी - न्यूज़ीलैण्ड से, एक सूवाई - फ़ीजी से, एक बैङ्क्स्टाउनी (ऑस्ट्रेलिया से), एक योकोहामी, एक मात्सुबाराई, एक सिङ्गापुरी, एक कलकतिया, दो मद्रासी, ग्यारह बङ्ग्लोरी, एक मङ्गलोरी, एक कोर्तालिमी (गोअन), दो हैदराबादी, एक पिम्परी चा, एक विले पार्ली, दो कानपुरी, एक ग्वालियरी, एक जयपुरी, एक ग़ाज़ियाबादी, एक चण्डीगढ़ी, सत्ताईस देहलवी (हाँ, सत्ताईस), एक रूवी (ओमानी), एक दुबई का भाई, एक स्पोल्तोरी, एक रोमन, एक मोङ्कालिएरी, एक कॉम्ब्स-ला-विले, एक द्यूसेल्दोर्फ़ी, एक ब्रेण्ट्फ़ोर्डी, 3 कैम्ब्रिजी, एक कार्डिफ़ी, एक स्टॉकहोमी, एक वास्तेरासी (स्वीडन ही), एक एस्पूई (फ़िनलैण्ड), एक साओपाओली, एक ब्रासिलियाई, एक वाटर्टाउनी, एक आइलैण्डियाई, एक व्हाइट प्लेनी, एक डिवॉल्टी, एक बाल्टीमोरी, एक आर्लिङ्ग्टनी, एक आउट्रिमाण्टी, एक किङ्ग्स्टनी, एक स्कार्बोरो जङ्क्शनी, एक केण्टनी, एक ब्लूमिङ्ग्टनी, एक शिकागोई, एक सेण्ट लुइसी, एक नॉक्स्विली, एक हैम्प्टनी, एक विक्सबर्गी, एक यूलेसी, एक ह्यूस्टनी, एक बोल्डरी, एक चीनो, एक लॉस एञ्जेलेसी, एक माउण्टेन व्यूई, एक फ़्रिस्कोई, और एक रेडमण्डी खाक छानने आए। बाद वालों की कड़ियाँ नहीं हैं, थक गया था। अब बताओ इसमें से तुम कौन कौन हो।
नक्शा

ऍण्ट्रांस

एक धाँसू चीज़, अनुवादकों के लिए। एक जीता जागता उदाहरण। जो भी अनुवाद करना है, उसके वाक्यांश अपने स्थल पर चढ़ा दो, लोगबाग अपने सुझाव दे सकते हैं, अपनी सुहूलियत के हिसाब से। साथ ही, बेनामी अथवा पञ्जीकरण समेत, दोनो तरह से काम किया जा सकता है। अनुवादों को स्वीकारना सञ्चालक के हाथ में है इसलिए अफ़रा तफ़री भी नहीं मचेगी। दूसरों के सुझाव भी आपको नज़र आते हैं। मिल जुल के अनुवाद करने के लिए बहुत अच्छा है। इसकी मदद से एक अच्छा सामूहिक अङ्ग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोष भी बनाया जा सकता है।

16.11.05

महामेधा

दिलचस्प स्थल की खोज करते करते पता चला कि सत्य , सत्य ही होता है। अमाँ यार कोई नई बात बताओ। स्थल यूनिकोडित है और इसमें ताज़े समाचार भी हैं। हाँ, थोड़ी अङ्ग्रेज़ी भी दिखी - ADODB.Field error '800a0bcd' Either BOF or EOF is True, or the current record has been deleted. Requested operation requires a current record. /middlestorymain.asp, line 30 शायद ये मिलाप वालों का अखबार है।

8.11.05

प्रेम रावत, गुरुघण्टाल

चमकीले जालस्थल पर न जाइए, ये गुरु जी, गुरु घण्टाल ही हैं। कैलिफ़ोर्निया में आलीशान बङ्ग्ला है, हैलिकॉप्टर है, जेट है, और चेलों के साथ व्यभिचार करने के आरोप भी हैं। खुलासा। कोई इस स्थल का हिन्दी अनुवाद करना चाहे तो बढ़िया हो, ऐसी जानकारियाँ जितनी भाषाओं में हों, उतना अच्छा है। आप देखेंगे कि फ़ायर्फ़ाक्स लिनक्स पर भी यह त्रुटि दर्शाता है, पर थोड़ी अलग तरह से। यहाँ पर अक्षरों के साथ मात्राएँ तो चिपकी हुई हैं, लेकिन शब्द छितरे हुए हैं। विण्डोज़ में इसी पन्ने को देखेंगे तो अक्षर, मात्रा, सब कुछ छितरा हुआ है। खैर दोनो ही प्रदर्शन त्रुटिपूर्ण हैं।

7.11.05

मैं हूँ ना

नहीं फ़िल्म नहीं, चिट्ठा

lang विशेषण

आज बात करते हैं ऍचटीऍमऍल के lang विशेषण की। विशेषण यानी ऍट्रिब्यूट। इसका इस्तेमाल कैसे होता है? <html lang="hi"> ... </html> इससे पता चलता है कि पूरा पन्ना हिन्दी में है। साथ ही, <p lang="hi"> ... </p> इससे पता चलता है कि इस अनुच्छेद का मसला हिन्दी में है। ऐसा क्यों करना चाहिए? किसी भी ब्राउज़र, खोजक या तन्त्रांश को पता लगाना हो कि सामग्री कौन सी भाषा में है, तो वो क्या करे? या तो वो कूटबन्धन देख सकता है, लेकिन कूटबन्धन यूटीऍफ़-8 हो तो भाषा कुछ भी हो सकती है। फिर, उस कूटबन्धन के कौन से अक्षरों का प्रयोग हुआ है, वह देख सकता है, जैसे कि क, ख ग। लेकिन उसमें भी पङ्गा है क्योंकि हिन्दी के अलावा अन्य भाषाएँ भी इन्हीं अक्षरों का प्रयोग करती हैं। इसलिए मान लीजिए कि आप गूगल पर लेख की खोज करते हैं, तो आपको मराठी के परिणाम भी मिलेंगे, और नेपाली के भी। चक्कर तो ये भी है न कि कितने सारे शब्द सभी भारतीय भाषाओं में एक समान भी हैं। यदि आप गूगल का 'केवल हिन्दी भाषा के स्थल खोजें' वाला विकल्प भी चुनें, तो भी कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता - वैसे ये विकल्प फ़िलहाल हिन्दी के लिए गूगल में उपलब्ध नहीं है, पर बाद में तो होगा। अतः इन विशेषणों का प्रयोग अपने पन्नों, अपने चिट्ठों के खाकों, अपने अनुच्छेदों में करें। आप पछताएँगे नहीं। और जानें

6.11.05

इण्टरनेट एक्स्प्लोरर हिन्दी में

हिन्दी भाषा ऍक्स पी पर स्थापित करने के बाद एक और लाभ मिला, वो ये कि नोटपॅड, इंटरनेट एक्स्प्लोरर आदि का अन्तरापृष्ठ भी हिन्दी में आता है। लेकिन ध्यान देने लायक बात यह है कि यदि आप इंटरनेट एक्स्प्लोरर की खोज करते हैं तो ठीक है, लेकिन, इण्टर्नेट एक्स्प्लोरर या इंटर्नेट एक्स्प्लोरर या इंटर्नेट ऍक्स्प्लोरर या इण्टर्नेट ऍक्स्प्लोरर या इंटरनेट ऍक्स्प्लोरर पे खोज मारी तो हाथ मलते रह जाएँगे।

5.11.05

विण्डोज़ ऍक्स पी लॅग्वेज इंस्टॉलेशन पॅक

इसे आजमा के देखा। पूरा अनुवाद नहीं है, और कई जगह अनुवाद खटकता है। लेकिन एक अच्छी शुरुआत है। इसके लिए विण्डोज़ ऍक्स पी सर्विस पॅक 1 चाहिए। मेरा जालस्थल ठीक नहीं चल रहा था, सो कल यह नहीं छप पाया। इस बीच कन्हैया रस्तोगी ने भी इस बारे में लिखा है।

3.11.05

इण्डियाप्रेस - इंस्क्रिप्ट कुञ्जीपटल

इस यूनिकोड ने समस्याएँ भी कम नहीं खड़ी की हैं। अब, पहले इ की मात्रा लगा के उसके बाद व्यञ्जन छापना एक आम आदत है, ग़लती नहीं कहूँगा क्योंकि यह तो स्वाभाविक ही है। सम्पादन तन्त्रों में इतनी अकल होनी चाहिए कि बिना व्यञ्जन के मात्रा न छापने दें, और एक व्यञ्जन के ऊपर एक से अधिक मात्रा न लगने दें, और हलन्त के बाद मात्रा न लगने दें। अक्षरों को प्रदर्शित टुकड़ों के आधार पर विभाजित करना बहुत अच्छा काम नहीं है - इससे बेहतर होता कि मूल व्यञ्जन हलन्त वाले बनाते और उसके बाद स्वर आने पर हलन्त गायब किया जाता। बहरहाल, जो है सो है। और ये इंस्क्रिप्ट कुञ्जीपटल बढ़िया है, साइबरकैफ़े आदि में काम करने के लिए। ऊपर दिए वर्णन में मात्राओं की स्थिति सही नहीं है, लेकिन कुञ्जीपटल तो सही चल रहा है।

31.10.05

आराम करो

पञ्जाब इञ्जिनीयरिङ्ग कॉलेज में बस तीन तरह के प्राणी होते थे। एक वो, जो ऍमबीए की तैयारी करते थे, दूसरे वो, जो जीयारी की तैयारी करते थे, और तीसरे, जो आराम करते थे। अपन तीसरे वाले में थे। इस कॉलेज के एक और प्राणी मिले, कनिष्क रस्तोगी। ये जीयारी वाले हैं। वैसे जीयारी, कुछ ज़ियारत जैसा शब्द नहीं लगता? मैं सोच रहा हूँ कि हिन्दी में लिखने वालों में पॅक के बाशिन्दों की मात्रा इतनी अधिक कैसे है? किसी को कोई अन्दाज़ा है?

30.10.05

अर्नेट - इण्डिया

अर्नेट का अधिकारिक स्थल div align=both का इस्तेमाल करता है, और इसकी वजह से फ़ायर्फ़ाक्स पर इसकी रेड़ पिट जाती है। इसके बारे में मोज़िला के बग्ज़िला के तहत ब्यौरा दिया हुआ है।

28.10.05

प्रद्युम्न

बनारसी बाबू प्रद्युम्न की कविताएँ - चन्द्र को चन्द्रबिन्दु की तरह काम में लाने के असफल प्रयास का ज्वलन्त उदाहरण। पर क्या करें। उनका कोई डाक पता नहीं मिला वरना ठीक करने को बोल देते।

16.10.05

एक और मलयालम चिट्ठा

गिरगिट से पता चला कि ये चिट्ठा
वायनशाल सीमकळिल्लात्त विचारङ्ङळ्‍, निबन्धनकळिल्लात्त बुद्धि, अदम्यमाय चोदन, अनन्यसाधारणमाय क्रियात्मकत, बौद्धिकपरमाय उद्बुद्धत ..इवयॆल्लां वऴि मानवराशियुटॆ उयर्‍च्च
के बारे में है। और भी मिले - कलेषिन्रे लोकं, सांस्कारिकं, तोन्न्याक्षरङ्ङल, फ्रेयिमिलूटे.., खसाक्क्, समकालिकं, और सूर्यगायत्री

ये मुझे मिला, गौरव सबनीस को खोजते खोजते। वैसे आपने अर्ज़ी पर दस्तखत किए?
गौरव सबनीस

ब्लॉगर की फ़टी हुई है

वरुण को जो समस्या आई थी वही मुझे भी थी - 33 फ़ीसदी पे आ के प्रकाशन अटक जाता था। हिन्दी के बजाय अङ्ग्रेज़ी का जमाव कर के प्रकाशित किया तो ठीक हो गया। ब्लॉगर को सूचित करने का प्रयास असफल रहा। पर्चे में बार बार डाक पता ग़लत होने की त्रुटि दिखाता है, जबकि पता सही है। या खुदा! 28 अक्तूबर - सन्देश प्रेषण सफल रहा। देखते हैं आगे क्या होता है।

9.10.05

आज का नारद - गूगल

जीतू ने बताया इसके बार में। मैंने एक फ़ाइल बनाई है, ओपीऍमऍल की - जिसे एक बार में चढ़ाने से सभी चिट्ठे आ जाएँगे। फ़ाइल यहाँ पेश कर रहा हूँ - (नीचे है) - अपलोड नहीं कर पाया इसलिए आपको कॉपी पेस्ट कर के सँजोनी पड़ेगी। क्या करें - गूगल रीडर में जा के सत्रारम्भ करें। यदि खाता न हो तो पहले खोल लें और फिर सत्रारम्भ करें। उसके बाद, Your subscriptions पर जाएँ, वहाँ से, Add a feed पर चटका लगाएँ, और फिर Import subscriptions पर चटका लगाते ही आपसे ओपीऍमऍल फ़ाइल माँगी जाएगी। सँजोई गई फ़ाइल को चुन के Upload मार दें। बस हो गया काम। अभी देख नहीं है कि इसमें क्या क्या सुविधाएँ हैं। बेटा है, तो अभी काफ़ी बड़े होने की गुञ्जाइश होगी। खबर देने के लिए पुनः जीतू को धन्यवाद। फ़ाइल शुरू - <opml version="1.0"> <head/> - <body> <outline title="--" type="rss" xmlUrl="http://www.livejournal.com/users/alok/data/rss"/> <outline title=" !" type="rss" xmlUrl="http://arjhai.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="Latest entries from ashoka.blog-city.com" type="rss" xmlUrl="http://ashoka.blog-city.com/index.rss"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://bunokahani.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="-" type="rss" xmlUrl="http://hindini.com/eswami/wp-rss2.php"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://chhayaa.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://arunuvach.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://mumbaiblogs.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://rojnamcha.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://shabdashilp.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://sugamsangeet.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="Raviratlami Ka Hindi Blog" type="rss" xmlUrl="http://raviratlami.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://niravata.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://nuktachini.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://abheeruchi.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://harirampansari.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" - 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hindi" type="rss" xmlUrl="http://hindi.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://kehkashaan.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://deepshikha70.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://hrudaygaatha.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="-" type="rss" xmlUrl="http://desh-duniya.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="-" type="rss" xmlUrl="http://vigyaan.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://janapad.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://samvadiya.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://katingchai.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://ratina.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://pratibhaas.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://jeehna.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title="" type="rss" xmlUrl="http://theluwa.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://brmeena.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" ....." type="rss" xmlUrl="http://anoopbhargava.blogspot.com/atom.xml"/> <outline title=" " type="rss" xmlUrl="http://nishants.net/hindi/wordpress/?feed=rss2"/> </body> </opml> फ़ाइल समाप्त।

8.10.05

काँच ले लो काँच

श्नेय्दर क्रूस्नाष। दुबारा बोलिए, श्नेय्दर क्रूस्नाष। अग़र अभी तक शक ही था, तो अब पक्का हो गया है कि जर्मन संस्कृत से ही निकली है।

5.10.05

अशोक का शोक

अशोक के शोक के बारे में पढ़िए। वैसे लोग इतनी कविता कैसे लिख मारते हैं। यह एक चीज़ है जिसमें मैंने कभी भी हाथ नहीं आजमाया। निबन्ध, कहानियाँ लिखने की तो प्रतियोगतिएँ होती थी, पर कविता की कभी नहीं। जो होती थीं, कविता घोटने की ही होती थीं। कितनी सारी घोटी थी - जल की रानी से ले के झाँसी की रानी तक। पर इतना तो कभी दिमाग़ में नहीं आया कि खुद की कविता लिखी जाए। इससे पता चलता है कि इंसान का व्यवहार उसके वातावरण द्वारा प्रेरित होता है। जो कविताएँ गढ़ने की क्लास हुआ करती तो हम भी चेंपते रोज दो चार दो चार। चेंपे रहो।

3.10.05

आयतुल्लाह सीस्तानी

पहले सोचता था कि आयतुल्लाह, खुमैनी का नाम है। बाद में पता चला कि यह एक उपाधि है। आयतुल्लाह ही आयतुल्लाह मौजूद हैं फ़ारस में। सीस्तानी, खुमैनी, ख़ामनई, आमीनी, और न जाने कितने हैं। तो कोई ये बताए कि आयतुल्लाह का मतलब क्या होता है?

2.10.05

अग्रवाल पब्लिक स्कूल

यार मैं अग़र इन्दौर में होता तो अपने बच्चों को अग्रवाल पब्लिक स्कूल में पढ़ने भेजता। और कोई स्कूल है दुनिया में जिसका हिन्दी का यूनिकोडित स्थल हो?

29.9.05

कामिल बुल्के

सोच रहा था कि इन से सम्पर्क करूँगा, कि क्या वे जाल पर शब्दकोश बनवाने में मदद कर सकेंगे क्या? लेकिन पता चला कि उनका देहान्त हो चुका है, 1982 में? नहीं, मुझे नहीं लगता। क्योंकि मुझे याद पड़ता है कि उनका साक्षात्कार मैंने टीवी पर देखा था, और मेरे घर पर टीवी तो 84 के बाद ही आया है। पर जो भी है, प्रेरणा तो मिलती रहेगी उनसे। कभी न कभी तो नौ दो ग्यारह होना ही था। अक्सर कुछ चीज़ दिमाग़ में कौंध जाती है, और फिर लगता है कि कुछ किया जाए। पता नहीं होता है कि यह प्रेरणा कहाँ से और कब मिलेगी। पर मिल जाती है। पर फ़र्क है शौकिया तौर पर कुछ करने वाला जो कि जुनून सवार होने पर पेलने लगता है और जोश ठण्डा होने पर सुर्खाब के पर की तरह रफ़ूचक्क होने वाले इंसान में और जीवन समर्पित कर के कुछ करने वाले में। आसान नहीं होता निर्णय लेना, जब एक चीज़ पाने के लिए कुछ औरों को छोड़ने का फ़ैसला करना पड़े। यह फ़ैसला कामिल बुल्के ने किया। हमें क्या पता कि उन्होंने क्या तकलीफ़ें झेलीं? नहीं पता। और अब पता चलेगा भी नहीं। उनको हिन्दी या संस्कृत सीखने की प्रेरणा कहाँ से मिली। ज़रूर कुछ तो पसन्द आया होगा इस सब में, पर इसको चार दिन की चाँदनी के बाद भी बरकरार रखना - जीवन भर के लिए - आसान नहीं है। जापानी, तगालोग तो मैंने भी सीखी है लेकिन इतनी तो नहीं कि सब कुछ भूल भाल कर उसी में लग जाऊँ। कभी कभार इंसान को लगता है कि वह इसी काम को करने के लिए बना है, तभी उसे वह कर पाता है वरना नहीं। ख़ास तौर पर तब जब वह भेड़ चाल न चल रहा हो। अचरज होता है न कि कामिल बुल्के ने यह सब क्यों किया? साथ ही कुछ लोग सोचते होंगे कि वह पागल ही था जो उसने इतना सब कुछ किया। विस्मय, करने की छूट है लोगों को।

23.9.05

ये इण्टर्नेट मेरे किस काम का?

मेरे कई मित्र और रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं, इसलिए यह लेख लिखा है। भई पहले तो यह नाम ही बोलना बहुत कठिन है, इसलिए हम इसे जाल ही बुलाएँगे। जाल, यानी जैसे इन्द्रजाल। तो आप पूछ रहे थे कि जाल है किस काम का? इसमें तो शक नहीं कि बिना जाल के हमारी ज़िन्दगी भली भाँति चल रही है, या थी। आखिर 1995 में ही सार्वजनिक रूप से इसमें इतनी अधिक बढ़ोतरी आई। था तो ये काफ़ी पहले से ही। तो पहले ये समझते हैं कि ये है क्या चीज़। या हो सकता है कि आपको मालूम हो कि जाल क्या है, पर मैं आपको जाल को देखने समझने का एक अलग नज़रिया देता हूँ, मेरा नज़रिया। मैं पढ़ा हूँ केन्द्रीय विद्यालयों में। वहाँ पर हर तिमाही में (या चौमाही में? भूल ही गया हूँ!) एक प्रोजेक्ट वर्क करना होता है, हरेक विषय के बारे में। तो मैंने अपने एक और मित्र के साथ एक बार चाँद के बारे में प्रोजेक्ट बनाया। उसके लिए जानकारी लेने गया था डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी, जुड़ पुखड़ी, गुवाहाटी में। उन दिनों पिताजी गुवाहाटी में थे। वहाँ पर इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के ऍम वाली पोथी खोली और उसमें से टीपना शुरू किया। इंसाइक्लोपीडिया आप घर नहीं ले जा सकते हैं, इसलिए रोज स्कूल के बाद जा के टीपता था। और तैयार हो गया प्रोजेक्ट वर्क। इसी तरह एक बार मैंने कैंसर पर परियोजना की, उसके लिए ऍनसीईआरटी दिल्ली के पुस्तकालय में वही काम किया जो गौहाटी में किया। वह तो मेरा साथी विपुल ऍनसीईआरटी कैम्पस में रहता था तो काम बन गया, वरना मैं तो दिल्ली में ऐसे किसी पुस्तकालय को नहीं जानता था जहाँ पर इंसाइक्लोपीडिया मिलती हो। स्कूल में भी नहीं थी। फिर मैं गया काम करने सिलतारा, गुम्मिडिपुण्डी, मोटी खावडी। इन जगहों के नाम शायद ही आपने सुने हों, यदि सुने हों तो आइए बतियाएँगे इनके बारे में। पर वो फिर कभी। यहाँ पर पुस्तकालय तो क्या मैगज़ीनों की दुकान तक नहीं होती थी। हर इतवार को शहर जाता था, एकाध किताब खरीदता था (वह भी महँगी होती थीं इसलिए कम ही), एक फ़िल्म देखता था और खाना खा के वापस आता था। मैं सोचता हूँ, वहाँ के बच्चे अपने प्रोजेक्ट वर्क कैसे करते होंगे? आख़िर केन्द्रीय विद्यालय तो सभी जगह हैं। चलिए, अब मुझे गुम्मिडीपुण्डी से जब लखनऊ जाना होता था तो मद्रास से ट्रेन मिलती थी। उसका टिकट लेने के लिए, पहले एक ट्रेन पकड़ के मद्रास सेंट्रल आता था, वहाँ दूसरी मंजिल पर टिकट काउण्टर था। अभी भी है। पहले एक लाइन में लगता था कि पता करें कौन से दिन की मिल रही है। जब वो पता चल जाता था तो टिकट लेने वाली लाइन में लगता था। पर लाइन इतनी लम्बी होती थी कि कभी कभी नम्बर आते आते रिज़र्वेशन खत्म। वहाँ क्लर्क को बोलो कि देख के बताए कब की मिल रही है तो या तो वो बता देगा, या कहेगा कि इन्क्वाइरी यहाँ नहीं होती। तो हो गया काम तमाम। फिर टिकट लेने के बाद ही छुट्टी माँग सकते हैं न। अग़र छुट्टी की मनाही हो गई या तारीख बदल दी गई तो फिर जा के वही सब करो। ये सब चीज़ें हमारे जीवन में आम हैं। इतनी आम कि अक्सर जब जसपाल भट्टी का उल्टा पुल्टा देखते हैं या पङ्कज कपूर का ऑफ़िस ऑफ़िस देखते हैं तो कई बार तो हँसी ही नहीं आती, समझ नहीं आता कि इसमें चुटकुला क्या है, आख़िर इतनी आदत जो पड़ गई है टेढ़े तरीके से काम करने की। जब मैं इन गाँवों में रहता था तो काम भी बहुत होता था, सुबह आठ से रात के 9-10 बजे तक। घर पर फ़ोन करने का मौका नहीं मिलता था। मिलता भी था थो हमेशा एक नज़र लाल रङ्ग के नम्बरों पर लगी रहती थी, कि कब सौ पार होगा और चोगा रखना होगा। और अग़र घर वाले फ़ोन करना चाहें तो कर ही नहीं सकते, क्योंकि करेंगे तो कहाँ करेंगे? अब आइए वापस जाल पर आते हैं। समझिए सारी दुनिया ने अपने घर या दुकान पर एक फ़ोन लगा रखा है, जिसमें उस घर या दुकान के बारे में जानकारी लगातार दोहराती जाती रहती हो। आप जैसे ही फ़ोन का नम्बर मिलाएँ, आवाज़ बोलने लगे। बस आपको यह पता करना होगा कि क्या चीज़ पता करने के लिए कहाँ फ़ोन लगाना होगा। रेल की जानकारी के लिए ये नम्बर, चाँद की जानकारी के लिए कुछ और, और कैसर के लिए कोई और। कैसा रहेगा? ऍसटीडी बूथ में जाइए और पता कर लीजिए कि कौन सी तारीख का कौन सी क्लास का टिकट मिल रहा है। और अग़र घर पर फ़ोन हो तो और बढ़िया। घर में कोई वयोवृद्ध हो या बीमार हो तो वह भी यह सब तो पता कर सकता है, दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा। अब मान लीजिए कि यही फ़ोन लगातार वही बात रट्टू तोते की तरह नहीं बताता है, बल्कि आपको विकल्प देता है, कि कानपुर की गाड़ियों की जानकारी के लिए 1 दबाएँ, कलकत्ते के लिए 2, आदि। मतलब आपका समय और बचेगा। और उसके भी ऊपर, समझिए कि आपको चुरू जाना है और चुरू की जानकारी नहीं है। तो आप फ़ोन वाले के लिए सन्देश छोड़ सकें कि भइए, चुरू की जानकारी भी देना शुरू करो। तो कैसा रहे? इसी तरह समझिए कि मेरे घरवाले मुझसे जब भी बात करना चाहें, अपने नम्बर पर कुछ रिकॉर्ड कर के छोड़ दें। जब मुझे समय मिले तो मैं वह नम्बर डायल करके उसे सुन लूँ, और जवाब भी रिकॉर्ड कर लूँ। तो कैसा रहे? आप कहेंगे कि आमने सामने बात करने से बढ़िया तो कुछ भी नहीं है। हाँ, सो तो है। पर आप हमेशा तो ऐसा नहीं कर सकते हैं न। ऊपर के उदाहरणों में ही हमने देखा। एक इंसान एक समय में एक ही जगह रह सकता है, इसीलिए उसे एकदेशी कहते हैं। तो इतना निश्चित है कि इस विधि से आप पहले के मुकाबले अधिक लोगों से सम्पर्क में रह सकेंगे, जानकारी जल्दी प्राप्त कर सकेंगे और समय भी बचाएँगे। अब आप यहाँ पर फ़ोन के बजाय कम्प्यूटर का पर्दा रखें। कम्प्यूटर की मदद से आप एक फ़ोन नम्बर मिलाएँगे, और फिर कम्प्यूटर के पर्दे पर बताएँगे कि आप को क्या जानकारी चाहिए। कम्प्यूटर खोज कर बता देगा कि आपको जो चाहिए, वह कहाँ उपलब्ध है, और वह जानकारी - लिखित, छवि ध्वनि या वीडियो के रूप में आपके सामने फ़ोन लाइन के जरिए पेश कर देगा। चाँद और कैंसर के बारे में मैं दिल्ली में घर बैठे भी पता लगा सकता हूँ। ट्रेनों के बारे में जानकारी मुझे घर बैठे मिल सकती है। जो नई गाड़ियाँ या स्पेशल गाड़ियाँ चलती हैं, उनके बारे में भी पता लगा सकता हूँ, उनकी जानकारी तो टाइम टेबल में भी नहीं होती है। और यह सब कुल छः सौ रुपए महीने, एक फ़ोन और लगभग बीस हज़ार की लागत के एक कम्प्यूटर की मदद से। सोचिए, जो लोग जाल का रोज इस्तेमाल करते हैं, उनके पास कितनी जानकारी है। जानकारी न हो तो भी जानकारी सरलता से प्राप्त करने का कितना अच्छा तरीका है। यह आपकी रोज की दुनिया को कैसे बदल सकता है। मद्रास में बैठे आप हिन्दी का अखबार पढ़ सकते हैं। कभी देखा है मद्रास में हिन्दी का अखबार? एयर डेक्कन की एक रुपए वाली टिकट सुबह पाँच बजे अपने घर से बाहर निकले बिना बुक कर सकते हैं। बच्चों के लिए अच्छे स्कूलों और कॉलेजों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते है। इतना ही नहीं, इन सबके बारे में दूसरों से राय ले सकते हैं, आप जिन लोगों को जानते तक नहीं उनसे मदद ले सकते हैं और उनकी मदद कर सकते हैं। नई भाषा सीख सकते हैं, अङ्ग्रेज़ी, तमिल, आदि। और भी बहुत कुछ कर सकते हैं। तो आपको पूछना चाहिए, कि जाल हमारे किस किस काम का है? यह नहीं कि जाल हमारे किस काम का है? आप अपने घर पर बनाए सामान को जाल पर सजा के (तस्वीरों की बदौलत) उन्हें बेच सकते हैं। आप पता कर सकते हैं कि आपके बच्चे को जो दवाई पिलाई जा रही है, उसके साइड इफ़ेक्ट क्या हैं। आपकी जायदाद को लेके जो कानूनी पचड़ा है, उसके बारे में कानून क्या कहता है? बिना किसी डॉक्टरी या वकालत की किताब खरीदे। आप जाल पर फ़ोन नम्बर खोज सकते हैं। घर पर मोटी मोटी फ़ोन डायरेक्टरियाँ रखने की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी हर साल और जगह घेरती हैं, और उनमें नए नम्बर तो मिलते भी नहीं हैं। आप घरेलू सामानों के दाम पता कर सकते हैं, कौन से ब्राण्ड सस्ते हैं, कौन से मॉडल में क्या सुविधाएँ हैं। अब तक आपको ये सब जानकारी अपने पड़ोसी, दफ़्तर वाले, और रिश्तेदार देते आए थे। अब आप और अधिक स्रोतों से यह पता कर सकते हैं। यदि आप अच्छा लिखते हैं, तो जाल पर अपने लेख भी लिख सकते हैं। पर आप यह सब करेगे कैसे? सब कुछ तो अङ्ग्रेज़ी में है। फ़ोन पर बात करने में तो हिन्दी की कोई मनाही नहीं है। हिन्दी चैनल टीवी पर देखने की भी कोई मनाही नहीं है। उसी तरह जाल पर भी हिन्दी में सब कुछ करने में कोई मनाही नहीं है। बस इसके बारे में लोगों को पता कम है। और अग़र कम पता है तो और पता किया जा सकता है। हाँ, आपके और बहुत सवाल होंगे। पूछिए।

17.9.05

अनुगूँज 14: हिन्दी जाल जगत: आगे क्या?

Akshargram Anugunj पन्द्रह सितम्बर 2005 वाले पखवाड़े के अनुगूँज का विषय है हिन्दी जाल जगत: आगे क्या? इस पर पहले भी चर्चा हो चुकी है, लेकिन उसका उल्लेख करके आपको पूर्वाग्रहग्रस्त न करते हुए केवल एक तथ्य (तथ्य, राय नहीं) आपके सामने पेश करता हूँ। हिन्दी के कुल जालस्थलों की सङ्ख्या इस वक़्त छः सौ से कुछ अधिक है। पर निश्चय ही सात सौ से कम है। इनमें भी काम की चीज़ ढूँढने जाएँ तो रो पिट कर अन्य भाषाओं के स्थलों से काम चलाना पड़ता है। अब इस तथ्य से सम्बन्धित अपनी राय दीजिए। (1) क्या यह स्थिति वाञ्छनीय है? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों नहीं? (2) इतना तो निश्चित है कि जाल पर हिन्दी बढ़ेगी। पर क्या बढ़ने की रफ़्तार वही रहेगी जो अभी है? या रफ़्तार कम होगी? या रफ़्तार बढ़ेगी? (3) क्या हिन्दी जाल जगत को सर्वाङ्गीण विकास की आवश्यकता है? क्या विकास की दिशा का नियन्त्रण किया जाना चाहिए या इसे अपने आप फलने फूलने या ढलने देना चाहिए? साथ ही, वैयक्तिक रूप से क्या हम इस विकास पर कोई असर डाल सकते हैं? ज़रूरी नहीं कि इन सभी पहलुओं पर आप लिखें, यह भी ज़रूरी नहीं कि आप इनमें से किसी भी पहलू पर लिखें। अनुगूँज की चेंपी लगी होगी तो आपके लेख को शामिल कर लिया जाएगा :) अन्ततः यह अवसर देने के लिए धन्यवाद। अनुगूँज है क्या? अपने लेखों की कड़ियाँ टिप्पणियों में डालने का कष्ट करें। या फिर ट्रॅकबॅक कर दें (आज तक मुझे पता नहीं चला है कि यह करते कैसे हैं)। लेख के साथ अनुगूँज की छवि लगाना न भूलें। इस प्रविष्टि में टिप्पणियाँ निषिद्ध हैं, क्योंकि टिप्पणियों का इलाका मूल प्रविष्टि है।

16.9.05

दहेज

अपने विचार व्यक्त करके मुझे आलोकित करें। नौ दो ग्यारह होते हैं अब। news:alt.language.hindi पर भी।

9.9.05

अपने जालस्थल को लोकप्रिय बनाएँ

कुछ नुस्खे। अपनी राय लिखिए। आपकी सलाह भी शामिल करता हूँ, आपके नाम के साथ। यह दस्तावेज़ ग्नू मुक्त प्रलेखन अनुमतिपत्र के तहत उपलब्ध है, यानी कि आप इसे कहीं और भी प्रकाशित कर सकते हैं, बशर्ते कि यही अनुमतिपत्र उस प्रति पर भी लागू हो।

6.9.05

हिन्दिका

हिन्दिका, व्यवसायिक यूनिकोडित हिन्दी स्थल बनाने की ओर अग्रसर एक प्रयोग है। जो सुविधाएँ अभी जाल पर हिन्दी में उपलब्ध नहीं है, और निःशुल्क रूप से नहीं प्रदान की जा सकती है, अथवा की जा सकती हैं पर उनमें प्रयास बहुत लगेगा, वे यहाँ आपको मिलेंगी। क्या देखना और करना चाहेंगे आप हिन्दिका पर?
  • मुम्बई से रतलाम की रेलवे समय सारिणी, आरक्षण के बारे में पता करना
  • आज पूना से भोपाल हवाई जहाज़ से जाने के लिए सबसे सस्ती टिकट के बारे में पता करना
  • दशहरे पर हिन्दी में ईकार्ड प्रेषण
  • डॉक्टर से स्वास्थ्य सम्बन्धी बातचीत व शङ्का समाधान
  • जालस्थल बनाने के लिए विस्तृत प्रशिक्षण सामग्री
  • कम्प्यूटर पर आम काम करने के बारे में सचित्र निर्देश
  • बङ्गलोर शहर के दर्शनीय स्थल, दाम, खरीदने के लिए चीज़ें
  • नौकरियों की अर्ज़ियाँ भरने की तारीखें
  • निबन्धों का सङ्ग्रह, टोपो मारने के लिए
  • प्रोग्रामिङ्ग भाषाओं के बारे में जानकारी व कुञ्जियाँ
  • और क्या? लिखिए टिप्पणियों में। टिप्पणी - निःशुल्क रूप से नहीं प्रदान की जा सकती है से अभिप्राय यह है कि किसी को पैसा खर्चना होगा, ज़रूरी नहीं कि स्थल के प्रयोक्ता को ही।
  • 2.9.05

    जीमेल, हिन्दी में

    दुनिया में पहली बार, पूर्णतः हिन्दी में कोई डाक सेवा तैयार हुई है, जीमेल - पता नहीं आपके खाते में हिन्दी वाला विकल्प है या नहीं, पर यदि नहीं है तो शीघ्र ही आ जाना चाहिए। हिन्दी में डाक, जीमेल की ईमेल

    30.8.05

    ग़ज़लें

    श्रिङ्गार रस से ओत प्रोत। छुपाने से मेरी जानम कहीं क्या प्यार छुपता है ये ऐसा मुश्क है ख़ुशबू हमेशा देता रहता है। वैसे सङ्कलनकर्ता आईआईटी कानपुर की पढ़ी हैं।

    27.8.05

    404 की झड़ी

    इतना तो पता था कि आयकर वालों के कई दस्तावेज़ गोपनीय होते हैं, लेकिन यहाँ तो झड़ी लगी हुई है। पर बाकी स्थल ठीक ठाक है।

    22.8.05

    हिन्दवी

    कुछ लोग, सोचते हैं, कुछ बाते बनाते हैं, और कुछ करते हैं। अभिषेक चौधरी करने वाले प्रतीत होते हैं। उम्मीद है मुलाकात होगी, जाल पर ही सही, और होती रहेगी। कड़ी के लिए रमण कौल को धन्यवाद।

    19.8.05

    मर्म-ए-सफलता

    गोपनीयता धोरण? धोरण यानी पॉ़लिसी? बढ़िया है। छा गए आप तो। प्रयास अच्छा है, पर आपको ऐसा नहीं लगता कि अनुवाद कहीं कहीं खटकता है? शब्दशः अनुवाद में यही पङ्गा है। लेकिन जो भी हो। बढ़िया है।

    16.8.05

    छन्दस्

    एक और हिन्दी की मुद्रलिपि। अच्छी बात - संयुक्ताक्षर बहुत सारे हैं। बुरी बात - दिखने में उतना अच्छा नहीं है। लेकिन स्थल पर एक इण्डिक आई ऍम ई भी है, और माइक्रोसॉफ़्ट की मुद्रलिपि विकास सम्बन्धी फ़ाइलें भी हैं। पता नहीं - कि ये मुद्रलिपि कौन से लाइंसेंस के अन्तर्गत मौजूद है। मिहाइल बयारिन जी स्पष्ट कर दें तो कृपा होगी।

    3.8.05

    शिकायती टट्टू?

    दिल्ली के शिकायती टट्टुओं के लिए सरकार ने प्रशासनिक सुधार का एक स्थल बनाया है। शिकायतें लगाने पर पाँच हज़ार रुपए का इनाम तक दिया जाएगा।

    29.7.05

    फ़ोकट के विलायती बैरिस्टर

    सामुदायिक क़ानूनी सेवा डायरेक्ट - इनका सेवा कोष भी है। बरतानिया में कभी कानूनी दिक्कत हो तो पहले 0845 345 4 345 मिला के मुफ़्त सलाह लें। शायद वे आपको कुछ पैसे भी थमा दें।

    26.7.05

    खुल गया भेद

    लेकिन उन दिनों इनकी ज़ुबान से हिंदी शायद ही कभी निकलती थी, अंग्रेज़ी मीडिया के पत्रकार थे और नामीगिरामी अंग्रेज़ी स्कूलों में शिक्षा पूरी की थी. वही पत्रकार धड़ल्ले से तो नहीं लेकिन अच्छी तरह समझ में आ जानेवाली हिंदी बोल रहे थे. मैने अपने एक पुराने संपादक से पूछा कि हिंदी अचानक इतनी फ़ैशनेबल कैसे हो गई.
    क्यों? किसीने पन्द्रह साल पहले सोचा था कि ऐसा होगा? और यही हिन्दी के जालस्थलों के साथ भी होगा।

    19.7.05

    गुमशुदा की तलाश

    याद है, हर रोज 6:55 को दूरदर्शन पर खोए हुए व्यक्तियों की सूचना आती थी? उद्घोषिका मुस्कुरा के कहती थी, 'आइए अब आपको खोए हुए व्यक्तियों की सूचना दे दें?' फिर किसी ने शिकायत की कि मुस्कुरा के क्यों बोल रही हैं, तो सञ्जीदा हो के घोषणा होने लगी थी। दो करोड़ पचास लाख पाइए: बिन लादेन, ऐमान अल ज़वाहिरी,अबू मसाब अल ज़रक़ावी, पचास लाख डॉलर पाइए: हबीस अब्दुल्ला अल साउब, सैफ़ अल आदेल, अब्दुल्लाह अहमद अब्दुल्लाह, अहमद मोहम्मद हामिद अली, अनस अल लिबी, मुहसिन मूसा मतवाल्ली अतवाह, फ़ाहिद मोहम्मद अल्ली म्सलाम, मुस्तफ़ा सेतमारियम नासर मुफ़्त में पकड़ाइए - ऐडम याहिये गदाहन और अन्त में, ऊपर वाली पट्टी की हिन्दी ठीक करने के लिए मेरी ओर से पाँच डॉलर इनाम। चिट्ठी लिख दी है

    6.7.05

    मॉडम नहीं चल रहा

    फ़ेडोरा कोर 4 पे मेरा डायलप मॉडम नहीं चल रहा है। kudzu की मदद से खुजली की लेकिन फिर भी कोई असर नहीं। /dev/ttyS0 को मानता ही नहीं है। रेड हॅट 8 में झकास चल रहा था। हर बार कुछ न कुछ तो होता ही है।

    4.7.05

    मैसूर - बढ़िया है

    सर्वविदित हो कि अब मैसूर का वृन्दावन गार्डन और भी बढ़िया हो गया है। ताज़े हिन्दी गानों की धुन पे झरने, झकास हैं, सबसे बढ़िया था, कोई कहे पे। और यह रहा श्रीरङ्गपट्टना में रङ्गनाथ मन्दिर के निकट खड़ा सुन्दर रथ। रङ्गनाथ मन्दिर के पास रथ

    27.6.05

    ओय चल गया

    पङ्गा ये था कि जावा की जावा चाहिए थी, जो कि थी, लेकिन पथ में जीसीजे थी। अब इतना पता लगाने की नहीं हो रही है कि जीसीजे चल क्यों नहीं रहा है, इसलिए हम होते हें नौ दो ग्यारह।

    हे जावा वाले जीव, त्राहिमाम् त्राहिमाम्

    यदि कोई जीव यह बताने का कष्ट करेगा कि इस समस्या को नौ दो ग्यारह कैसे करें, तो आभारी होऊँगा। अन्त तक पहुँचने के बाद सब कुछ वहीं अटक जाता है, आगे बढ़ता नहीं है।



    23.6.05

    क्स्लिफ़्फ: क्या आप अनुवाद करते हैं?

    तो डर के नौ दो ग्यारह होने की ज़रूरत नहीं है। आजमाया नहीं है पर जालस्थलों का अनुवाद करने के लिए काम की चीज़ लगती है। विण्डोज़ और यूनिक्स व अन्य दोनों के लिए उपलब्ध है। बेटे - यानी सन, की पैदाइश है। नाम तो ऐसा है कि बोला ही न जाए। क्स्लिफ़्फ। उफ़्फ। पर पहले तो मैं यह जानना चाहता हूँ कि बन्दे ने सोलारिस पे ये डेमो कैसे बनाया।

    22.6.05

    ऍन टी ऍफ़ ऍस को कैसे चढ़ाएँ?

    मेरे पास दो विण्डोज़ विभाजन हैं, एक तो ऍन टी ऍफ़ ऍस है और दूसरा फ़ैट ३२। अब फ़ैट ३२ वाला तो मैंने फ़ेडोरा कोर ४ में माउण्ट कर दिया, कपिल जी को धन्यवाद। लेकिन ऍन टी ऍफ़ ऍस वाला रो दे रहा है।
    # mount -t ntfs /dev/hda1 /mnt/winc mount: unknown filesystem type 'ntfs'
    जब कि man mount कहता है कि
    -t vfstype The argument following the -t is used to indicate the file sys-http://www.blogger.com/img/gl.link.gif tem type. The file system types which are currently supported include: adfs, affs, autofs, coda, coherent, cramfs, devpts, efs, ext, ext2, ext3, hfs, hpfs, iso9660, jfs, minix, msdos, ncpfs, nfs, nfs4, ntfs, proc, qnx4, ramfs, reiserfs, romfs, smbfs, sysv, tmpfs, udf, ufs, umsdos, usbfs, vfat,
    तो माजरा क्या है? उम्मीद है कि कपिल जी अभी लिनक्स वाली डाक सूची से नौ दो ग्यारह नहीं हुए होंगे, वहाँ भी पूछता हूँ।

    21.6.05

    बैठ गया

    कम से कम परम वालों से तो कुछ बेहतर होने की उम्मीद थी। पर वो तो कहेंगे कि दूसरा विभाग है। पर उम्मीद में नौ दो ग्यारह होते हैं। दुनिया कायम है तो हम भी करेंगे।

    20.6.05

    सुकून

    वापस लिनक्स पर, सवा साल बाद। ज़्यादा पापड़ नहीं बेलने पड़े - फ़ॅडोरा कोर ४ की चार सीडी पैदा की, अपने इण्ट्रानॅट की मदद से। उसकी मदद से लिनक्स चढ़ाया, कुल समय एक घण्टा। उसके बाद, देखा कि देवनागरी दिख नहीं रही है। वैसे तो खुद ब खुद होनी चाहिए थी पर हुई नहीं। तो फिर उन्नति का लाभ उठाया। इसकी install.sh में फ़िलहाल फ़े़डोरा कोर ४ का अगरचा नहीं था, सो जोड़ना पड़ा। उसके बाद फ़ायर्फ़ॉक्स १.०.४ को फ़िर से बन्द कर के चलाया तो गार्गी का प्रावधान था। लिखने के लिए पॅनल पर कीबोर्ड इण्डिकेटर जोड़ा। ३ घण्टे, में सब कुछ निपटा करके नौ दो ग्यारह हो सकते हैं। शुक्रिया लिनक्स के जाँबाज़ खिलाड़ी श्रीधर को, तथा इण्डलिनक्स परियोजना वालों को। इसमें बोलनागरी कुञ्जीपटल भी है, ऐसा ही कुछ कालीचरण गायतोण्डे जी को चाहिए था, उम्मीद है कि मिल गया होगा। कितने कूल हैं हम।

    27.5.05

    और मैं रो पड़ा

    कई दिनों से मन में सवाल था कि हिन्दी में लिखने के पीछे हाथ धो के मैं क्यों पड़ा हूँ। अब नहीं है। क्योंकि हिन्दी को मेरी नहीं, मुझे हिन्दी की ज़रूरत है। अतुल जी को यह अहसास दिलाने के लिए धन्यवाद।

    9.5.05

    मॅक पे हिन्दी

    है न झकास? साइमन ब्राउन से साभार।

    गिरगिट को क्या बोलते हैं?

    माना कि हम अमिताभ बच्चन नहीं हैं, पर बता दो यार कि गिरगिट को क्या बोलते हैं? पञ्जाबी में? उड़िया में? कन्नड़ में? गुजराती में ? बाङ्ग्ला में? और मलयालम में?

    19.4.05

    गिरगिट रङ्ग बदलने को तैयार है

    इसकी मदद से आप किसी भी भारतीय लिपियों का मसला देवनागरी में बदल सकते हैं। ध्यान दें यह अनुवाद नहीं करता है, बस लिपि बदलता है। इसका इस्तेमाल कई स्थितियों में किया जा सकता है, जैसे कि गुजराती लेखों को देवनागरी में देखने के लिए, या यदि आपको किसी लिपि के बजाय बक्से दिखते हैं, उसे देवनागरी में देखने के लिए, या फिर भाषा सीखने के लिए। इसे दुतरफ़ा भी किया जा सकता है। फिर, आप पञ्जाबी को देवनागरी में लिख के बस उसे गुरमुखी में बदल के छाप सकते हैं। इसी प्रकार यदि किसी लिपि की मुद्रलिपियाँ साइबर कैफ़े में सुलभ न हों तो भी उसमें लेखन किया जा सकता है, यदि दूसरी किसी लिपि की मुद्रलिपियाँ हों तो। उदाहरण के लिए, गुजराती ब्लॉग मण्डल से ताज़ा सुर्खियाँ गिरगिट पर चेंप के देखिए:
    # રાખનાં રમકડાં મારા રામે રમતાં રાખ્યાં રે # વજુ કોટક - પ્રભાતનાં પુષ્પો # મૂળ રંગ # નિરમીશ ઠક્કર - ફલેટને ત્રીજે માળથી # ચંદ્રકાંન્ત શેઠ - શોધતાં # મોનીકા શાહ - તમે # 'કલાપી' સુરસિંહજી તખ્તસિંહજી ગોહિલ - આપની યાદી # પ્રેમ # ચંપકલાલ વ્યાસ - પિતાની ઝૂંપડી મધ્યે # હસે તેનું ઘર વસે # મકરંદ દવે - ગમતાંનો કરીએ ગુલાલ # દિવાબેન ભટ્ટ - લીલુંછમ # પ્રેમ # કુમુદ પટવા - ક્યાં છે? # ભગવતીકુમાર શર્મા - બે મંજીરાં # જમન કુંડારિયા - સિતારા # હરજીવન દાફડા - નીકળવું છે # ઇન્તઝાર # ૐ શ્રી ગણેશાય નમઃ # મારા મરણ પર # તમારી ઉડતી જુલફો # સદાશિવ વ્યાસ - "-" # રાવજી પટેલ - ગીત # ઉમાશંકર જોષી - ભોમિયા વિના # પ્રિન્સ અમેરીકા - તારી યાદ આવે છે - 1 # નર્મદ - જય જય ગરવી ગુજરાત! # કહે નેપોલિયન દેશને # તું હસે છે જ્યારે જ્યારે, # હસતે મુખ રસ્તામાં વેર્યા, # પ્રિતમદાસ - હરીનો મારગ છે શૂરાનો
    आपको पता चल जाएगा कि चल क्या रहा है:
    * राखनां रमकडां मारा रामे रमतां राख्यां रे * वजु कोटक - प्रभातनां पुष्पो * मूळ रंग * निरमीश ठक्कर - फलेटने त्रीजे माळथी * चंद्रकांन्त शेठ - शोधतां * मोनीका शाह - तमे * 'कलापी' सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल - आपनी यादी * प्रेम * चंपकलाल व्यास - पितानी झूंपडी मध्ये * हसे तेनुं घर वसे * मकरंद दवे - गमतांनो करीए गुलाल * दिवाबेन भट्ट - लीलुंछम * प्रेम * कुमुद पटवा - क्यां छे? * भगवतीकुमार शर्मा - बे मंजीरां * जमन कुंडारिया - सितारा * हरजीवन दाफडा - नीकळवुं छे * इन्तझार * ॐ श्री गणेशाय नमः * मारा मरण पर * तमारी उडती जुलफो * सदाशिव व्यास - "-" * रावजी पटेल - गीत * उमाशंकर जोषी - भोमिया विना * प्रिन्स अमेरीका - तारी याद आवे छे - 1 * नर्मद - जय जय गरवी गुजरात! * कहे नेपोलियन देशने * तुं हसे छे ज्यारे ज्यारे, * हसते मुख रस्तामां वेर्या, * प्रितमदास - हरीनो मारग छे शूरानो
    या फिर बाङ्ग्ला चिट्ठा संसार को भी रङ्ग बदलते देखिए:
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    बन जाएगा
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    है न काम की चीज़? आपके सुझाव आमन्त्रित हैं।

    गिरगिट को क्या बोलते हैं?

    एक आवश्यक जानकारी - गिरगिट को पञ्जाबी में क्या बोलते हैं? उड़िया में? कन्नड़ में? गुजराती में ? बाङ्ग्ला में? और मलयालम में? जल्द ही आ रहा है - गिरगिट (अभी चटका लगाना बेकार है)

    18.4.05

    जीपीऍल

    जीपीऍल के बारे में जानकारी, टिप्पणियों में चर्चा के लिए आप सभी आमन्त्रित हैं।

    17.4.05

    वेटा बाप से भी गोरा

    बेटा तो बाप से भी गोरा है। बाप को ठीक करने के लिए गूगल भइया को लिखा है। देखते हैं क्या करता है इस बार। बहरहाल, यूज्नॅट के समाचार समूह पर सन्देश भेजने के कई फ़ायदे है, बनिस्बत याहू समूह या गूगल समूह के। यूज़्नॅट के सन्देशों का आतिथ्य कई जगह होता है, इसके पुरालेख भी कई जगह मौजूद रहते हैं। तो आपकी बात जङ्गल की आग की तरह बहुत जगह, बहुत जल्द फैल जाएगी। बस चक्कर यह है कि डाक पता आपको फेंकू वाला इस्तेमाल में लाना होगा। एक सवाल, इन छवियों में जो सन्देश हैं, वे आपको अपने समाचार पाठक यानी न्यूज़रीडर से दिख रहे हैं क्या? बताइएगा। अपने पास तो अब कोई समाचार वाली सदस्यता रही नहीं, क्योंकि बर्लिन वालों ने तो पैसे माँगने शुरू कर दिए हैं। यदि किसी को कोई और फ़ोकट वाला पता हो तो बताने का कष्ट करें, बहुत आभारी रहूँगा, क्योंकि यूज़्नॅट न होता तो शायद मुझे बहुत देर से पता चलता कि जाल पर हिन्दी में कैसे लिखा जाए। जय हनुमान, शायद यह था पहला सन्देश जिसे पढ कर मुझे लगा कि ये तो बढ़िया है! हिन्दी के कुछ आदि सन्देशों में से एक। हेमन्त जी का साक्षात्कार पढ़ के लगा कि यूज़्नॅट को प्रायः भूल सा गया हूँ, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए था। भले ही यह चमक दमक वाला माध्यम न हो, इसकी पहुँच बहुत है। पर भूलने का मुख्य कारण सुगमता से लेखन व पाठन की सुविधा न होना ही था। आप भी चाहें तो गूगल बाप की समस्या के बारे में गूगल को लिख सकते हैं।

    13.3.05

    थोड़ा कहा बहुत समझना

    पहले मैंने सोचा की माकाश क्या है। फ़िर पता चला कि ऍम आकाश है। उम्मीद है कि हिन्दी वाले छक्के अक्सर मारेंगे।

    12.2.05

    सरस्वती

    स्टीफ़ान वॅब द्वारा बनाया गया आई ऍम ई। विण्डोज़ 2000 व ऍक्स पी पर चलेगा। इसके बारे में चर्चा यहाँ की जा सकती है, और इसका प्रलेखन भी अच्छा खासा है। कुञ्जियों का आयोजन है stdafx.cpp में - पर समझ नहीं आया कि इन सङ्ख्याओं का मतलब क्या है। कोई रौशनी फेंकेगा?
    keylayout Devanagari = {{
     {0x0966, 0x0029, 0x0030, 0x0029}, {0x0967, 0x0021, 0x0031, 0x0000}, {0x0968, 0x0950, 0x0032, 0x0040}, // 0 - 2
     {0x0969, 0x093c, 0x0033, 0x0023}, {0x096a, 0x0970, 0x0034, 0x0024}, {0x096b, 0x0952, 0x0035, 0x0025}, // 3 - 5
     {0x096c, 0x0951, 0x0036, 0x005e}, {0x096d, 0x0954, 0x0037, 0x0026}, {0x096e, 0x0953, 0x0038, 0x002a}, // 6 - 8
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     {0x091a, 0x091b, 0x0000, 0x0000}, {0x0926, 0x0927, 0x0921, 0x0922}, {0x090f, 0x090d, 0x090e, 0x0000}, // c - e
     {0x090b, 0x0960, 0x095e, 0x0000}, {0x0917, 0x0918, 0x0000, 0x0000}, {0x0939, 0x0903, 0x0000, 0x0000}, // f - h
     {0x0907, 0x0908, 0x0910, 0x0000}, {0x091c, 0x091d, 0x0000, 0x0000}, {0x0915, 0x0916, 0x0000, 0x0000}, // i - k
     {0x0932, 0x0933, 0x0934, 0x0000}, {0x092e, 0x0000, 0x0000, 0x0000}, {0x0928, 0x0923, 0x0000, 0x0000}, // l - n
     {0x0913, 0x0911, 0x0912, 0x0000}, {0x092a, 0x092b, 0x0000, 0x0000}, {0x090c, 0x0961, 0x0958, 0x0000}, // o - q
     {0x0930, 0x0931, 0x095c, 0x095d}, {0x0938, 0x0937, 0x0936, 0x0000}, {0x0924, 0x0925, 0x091f, 0x0920}, // r - t
     {0x0909, 0x090a, 0x0914, 0x0000}, {0x0935, 0x0000, 0x0000, 0x0000}, {0x0919, 0x091e, 0x0929, 0x0000}, // u - w
     {0x0902, 0x0901, 0x0959, 0x0000}, {0x092f, 0x095f, 0x0000, 0x0000}, {0x094d, 0x093d, 0x095b, 0x0000}, // x - z
     {0x003b, 0x003a, 0x003b, 0x003a}, {0x003d, 0x002b, 0x003d, 0x002b}, {0x002c, 0x003c, 0x002c, 0x003c}, // ";:", "=+", ",<"
     {0x002d, 0x005f, 0x002d, 0x005f}, {0x002e, 0x003e, 0x002e, 0x003e}, {0x0000, 0x003f, 0x002f, 0x003f}, // "-_", ".>", "/?"
     {0x0060, 0x007e, 0x0060, 0x007e}, {0x005b, 0x007b, 0x005b, 0x007b}, {0x0000, 0x0964, 0x005c, 0x007c}, // "`~", "[{", "\|"
     {0x005d, 0x007d, 0x005d, 0x007d}, {0x0000, 0x0000, 0x0027, 0x0022}, {0x0000, 0x0000, 0x0000, 0x0000}, //  "]}", "single/double quotes", VK_OEM_8
    }};
    
    
    ध्यान दें - यह कूट जी पी ऍल के तहत है, चेंपने से पहले।

    18.1.05

    सरकारी नौकरियाँ बाङ्गलादेशियों को

    फ़र्ज़ कीजिए कि हिन्दुस्तान के किसी अख़बार में कोई ऐसी ख़बर आए तो कैसा हाहाकार मच जाए। वही अमरीकियों ने किया है तो ताज्जुब की क्या बात है?

    17.1.05

    हालाँकि क्या?

    कुछ समझ नहीं आया, पर रूसी के अक्षर अच्छे हैं। कोई बता सकता है कि हालाँकि С уважением. का मतबल क्या है?

    16.1.05

    ई-लेखा

    कहते हैं कि ये इनका दूसरा प्रयास है। तो पहला कौन सा था? खुलासा करें। वैसे इन जीवित प्राणी को हम असली दुनिया में पहले ही जानते थे और चिट्ठे की मदद से अब और जानेंगे। स्वागत है मित्र। आशा है जल्द ही भेंट होगी। उम्मीद है कि उँगलियाँ खटखटाते रहेंगे। यानी कि कुञ्जीपटल पर। :)

    5.1.05

    आई आई टी रुड़की

    यह सुनके लगता है कि दो अलग अलग जगहों के नाम लिए जा रहे हों। पर क्या करें पुराने ज़माने का जो हो रहा हूँ। अभी से कुछ दस साल पहले रुड़की गया था - कुछ इम्तिहान देने, और फिर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गया।

    2.1.05

    हिन्दुस्तान का तलुआ

    जनाब इयुजिन डी बोएर को हिन्दुस्तान अलग लगा, और अच्छा लगा। होता है ऐसा, जब इंसान किसी नई जगह जाता है, और नई चीज़ देखता है। यहाँ फ़िलिपींस में मुझे इस बात से अचरज होता है कि लोग कितनी आसानी से, हमेशा हँसते रहते हैं, और विदेशियों को देख के आपस में खुसर फुसर नहीं शरू करने लगते। इयुजिन जी को शुभकामनाएँ।