22.12.07

अताउल्ला खां

अताउल्ला खां, नुसरत फ़तेह अली खाँ और अल्ताफ़ रज़ा, इन तीनों में ज़बर्दस्त होड़ रहती है मेरे दिमाग़ में, यानी जब भी कोई कव्वाली या दर्द भरा किस्म का गीत रेडियो पर आता है तो लगता है कि ज़रूर इन तीनों में से किसी का होगा। पर पता नहीं चल पाता कि वास्तव में किसका है। कोई तोड़ है इसका किसी के पास? पर अताउल्ला खां को ले कर अब ज़्यादा दिक्कत नहीं आएगी, इनसे पूछा जा सकता है। वैसे क्या आप संस्कृत का कोई ऐसा शब्द जानते हैं जिसमें बीच में पूरे स्वर आते हों? मात्रा नहीं, पूरा स्वर।

8.12.07

माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस ऑन्लाइन

माइक्रोसॉफ़्ट वाले आपका ऑफ़िस ऑन्लाइन में स्वागत कर रहे हैं, वह भी निःशुल्क, और वह भी हिन्दी में। पता चला कि माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस के सात अलग अलग संस्करण हैं, जेब के भार के आधार पर। सहायता और नुस्खे, और थोड़ा बहुत फ़ोकट का माल भी है, पर उतना नहीं जितना ओपन ऑफ़िस में, पर उसके बारे में मुक्त तंत्रांश दिवस पर।

7.12.07

(अरब स्वता) || (अरब्स वता)

मुझे नहीं पता था की अरबियों में जीभ बाहर निकालना भी लड़कियों को छेड़ने के तरीकों में गिना जाता है। आँख मारना, सीटी बजाना, आदि तो ठीक है, पर जीभ निकालने का काम तो बच्चे ही करते हैं अपने यहाँ, छेड़छाड़ की भाषा में तो नहीं गिना जाता है। एक बात और, अरबी फ़ारसी जानने वाले लोग उन शब्दों की देवनागरी की वर्तनियाँ भी अलग तरह से लिखते हैं, जिससे पता चलता है कि वास्तव में वह शब्द अरबी या नस्तलीक़ में कैसे लिखे जाते हैं। महकता आंचल नामक मासिक पत्रिका में भी अकसर कुरआन, आयना जैसी वर्तनियाँ नज़र आती हैं। वैसे यह अनुवाद दिलचस्प लगा मुझे। कोई अरबी नवीस या अरब निवासी बता सकते हैं कि स्वता मतलब क्या होता है? शायद यह अरब स्वता नहीं, अरब्स वता है।

धर्ममंडल

७५ साल पहले बने संगठन धर्ममंडल के स्थल पर यह गीत। बाकी स्थल अंग्रेज़ी का निकला। अवधी में है गीत। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।

6.12.07

केवल भक्ति

स्थल का शीर्षक यह बता देता है कि स्थल निर्माता किस इलाके के हैं - महाराष्ट्र/गुजरात में इ और ई की मात्राओं की उलट पुलट बहुत आम है, जैसे दीप्ति के बजाय दिप्ती - और बोलते भी कुछ कुछ वैसे ही हैं, तो ठीक है। केवल भक्ति पर मूषक फिराने से मनोरंजन तो होता ही है, जीवित अवस्था में परम मोक्ष पाने के नुस्खे आपको सीधे जळगांव से मिलेंगे। ऑडियो व्हीडियो कैसेट भी मिलेंगे। वैसे महाराष्ट्र के स्थलों की कुछ पहचान - १. संख्याएँ देवानगरी में २. इ और ई की मात्राओं की उलट पुलट (जिवित बनाम जीवित) ३. ळ का धड़ल्ले से प्रयोग ४. अंग्रेज़ी के शब्दों की विशिष्ट वर्तनी - जैसे वीडियो नहीं व्हीडियो ५. चन्द्र बिन्दु की अनुपस्थिति (कहा बनाम कहाँ) भाषा की विविधता ही कहेंगे इसे। बहरहाल यह सब मोह माया, नुक्ता चीनी को नौ दो ग्यारह मान के व्यक्त भावों पर ध्यान दें और ज्ञानचर्चा पढ़ें। केवल भक्ति

खाओ गगन, रहो मगन!

पर यह खाने वाला नहीं है, पढ़ने वाला है। वैसे गगन वनस्पति गायब कहाँ हो गया? [गायब या ग़ायब?] चन्द्रशेखर आज़ाद का इत्ता बड़ा काव्य संग्रह - बाप रे बाप। और ज़रूर हाइकु बाज़ों को यह विश्व का पहला भी पसंद आएगा। मगर सबसे बढ़िया चीज़ है बाल साहित्य। आज शाम को पढ़ता हूँ यह गगन।

5.12.07

हिन्दी वेबसाइट

जी हाँ, स्थल का नाम है हिन्दी वेबसाइट। यहाँ लिखा भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी का दोहा - या चौपाई, या सवैया या कवित्त ? मुझे फ़र्क नहीं पता - पसन्द आया -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
दिलचस्प बात यह है कि यहाँ एचटीएमएल और पेजमेकर सीखने के लेख भी हैं, ऐडसेंस का बेहिचक इस्तेमाल है, और एक दिलचस्प चिट्ठा भी है। बढ़िया काम है जी के ए जी। शायद वनस्पति आधारित चिकित्सा का भी एक विभाग बनाया जा सकता है।

4.12.07

गोकुल राजाराम - ऐडसेंस निर्माता

मेरे एक सहकर्मी ने खबर दी कि गोकुल राजाराम[अंग्रेज़ी] गूगल छोड़ रहे हैं। इस लेख से यह पता चला कि गोकुल ही गूगल के ऐडसेंस- ऐडवर्ड्स दल के नेता थे। दरअसल गोकुल जी के बारे में पहले भी अपने सहकर्मी सत्यप्रकाश जी के साथ चर्चा हुई थी, क्योंकि वह आईआईटी कानपुर में उनके तीन साल तक रूममेट थे। गोकुल १९९५ के आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस[अंग्रेज़ी] के टॉपर थे। कंप्यूटर साइंस में भर्ती पाना तो वैसे ही कठिन है, वह भी कानपुर आईआईटी में, उसमें भी पहला नंबर आना - कोई मज़ाक नहीं है। मेरे सहकर्मी बताते हैं कि गोकुल की याददाश्त ऐसी थी जैसे कि चाचा चौधरी की - यानी कंप्यूटर से भी तेज़। पढ़ने की गति बहुत ही तेज़, और जो पढ़ते थे वह भी - चाहे उपन्यास ही हो - हमेशा के लिए याद। मेरे जैसा अगर कोई अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ता है तो किताब खत्म होते होते कहानी तो याद रहती है पर पात्रों के नाम भूल जाते हैं। पर आप उनसे अभी भी पूछ सकते हैं कि कौन से उपन्यास में कौन से पात्र थे और क्या कहानी थी, वह बता देंगे। और सबसे बड़ी बात जो मेरे सहकर्मी उनके बारे में बताते हैं वह यह है कि उनमें ज़रा भी घमंड की भावना नहीं है। आमतौर अपने जैसी निपुणता वालों के साथ तक ही अपना मेलजोल रखते हैं। पर इनके साथ ऐसा कभी नहीं था। न कोई घमंड न कोई दंभ। सोचता हूँ, कोई आईआईटी में भर्ती होने के बाद भी नंबर वन रहने की तमन्ना रखे और उसे पूरा भी करे - कितना दृढ़ निश्चय चाहिए। गोकुल लगभग एक साल तक आईआईटी के समय दिन में केवल चार घंटा सोते थे ऐसा मेरे सहकर्मी बताते हैं। उन्होंने पहले से ही सोचा हुआ था कि अनुसंधान के बजाय व्यापार की ओर बढ़ेंगे, और वही किया - एमआईटी के स्लोन[अंग्रेज़ी] से एमबीए किया था, और फिर गूगल में भर्ती हुए। गूगल हर काम खुफ़िया तरीके से ही करता है, आज ही पता चला कि गूगल के ऐडसेंस के पीछे भी उन्हीं का हाथ है, जब उनके छोड़ने की खबर आई। गूगल के अन्दर भी उनकी काफ़ी धाक है, वह इस लेख की टिप्पणियों[अंग्रेज़ी] से पता चलता है। आमतौर पर मितभाषी गूगलियों ने भी काफ़ी टिप्पणियाँ की हैं। आज उनकी बदौलत गूगल तो इतनी ऊँचाई तक पहुँची ही है, कोई भी आम प्रकाशक आर्थिक रूप से स्वतन्त्र रहते हुए प्रकाशन करने की सोच सकता है, उसे बड़े स्थलों और कंपनियों पर निर्भर रहने या उनके द्वारा डकारे जाने की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। स्वतन्त्र रूप से प्रकाशन करने के लिए प्रोत्साहित करने में गोकुल की बनाई ऐडसेंस का बहुत बड़ा हाथ है। हाशिये पर मौजूद भाषाएँ, विचार और संस्थाएँ भी इस आर्थिक संबल के जरिए अपनी बात उतनी ही दृढता से आगे रख सकती हैं जितनी मुख्यधारा के प्रकाशक, सशक्त भाषाओं और आंदोलनों के प्रकाशक। क्या गोकुल ने सोचा था कि ९५ में आईआईटी से निकलने के बाद वह एक ऐसी चीज़ बना देंगे जो पूरी दुनिया की नक्शा ही बदल देगी? मुझे तो लगता है कि ज़रूर सोचा होगा। बिना योजना के कोई कार्य पूरा नहीं होता और केवल योजना बनाने से सिर्फ़ शेखचिल्ली पैदा होते हैं। गोकुल ने योजना भी बनाई और उस पर क्रियान्वयन भी किया। इतना ही नहीं, ऐसा व्यक्तित्व कि कोई रूममेट आज भी - १३ साल बाद - उन्हें याद करे - यही कह सकते हैं कि धरती माता धन्य हुई ऐसे सपूत[अंग्रेज़ी] को पा के। मुझे विश्वास है कि अभी और भी आना बाकी है गोकुल की ओर से! जैसे सरकिट कहता है, अपुन के पास एक और बम है - ज़रूर गोकुल के पास और भी हैं - और हम सबके पास भी।

3.12.07

जगतहितकारिणी - ९८ साल पुरानी हिन्दी

नहीं, जगत हितकारनी है किताब का नाम। लेखक हैं श्री अनोपदास जी। १९०९ में छपी किताब जस की तस यहाँ उपलब्ध है। पहला पन्ना छवि प्रारूप में है, पर आगे के यूनिकोडित हैं, आखिरी तक। सामग्री तो पूरी नहीं पढ़ पाया पर अधिक सूद पर उधार लेने देने पर काफ़ी चर्चा है। भाषा की शैली से पता चलता है कि ९८ साल पुरानी हिन्दी कैसी थी। जगतहितकारिणी आज सुबह सुबह "पंजाब दा दुद्ध एकदम शुद्ध" पीते हुए सोच रहा था कि अनोपदास जी आज होते तो ज़रूर यह पूछते कि रेलवे के टिकट खरीदने के लिए अंग्रेज़ी जानना ज़रूरी क्यों है - शायद हलचल जी बता पाएँ!

हिन्दी का एक और डिग

पहले एक हिन्दी के डिग की चर्चा हुई थी, पर लगता है वह डिग अभी गड्ढे खोद खोद कर उन्हीं में सो रहा है। आज एक और मिला, वह है हिन्दी पेपर। बढ़िया है। सारे कोने वेब-२ वाले गोल गोल हैं!

29.11.07

भारत टेक्स्टाइल

मेरे एक करीबी (करीबी या क़रीबी?) रिश्तेदार कपड़ा उद्योग में काम करते हैं, और आजकल वहाँ - कम से कम निर्यातकों में - मायूसी छाई हुई है, जो माल बेचने का वादा डॉलर के ४६ के भाव पर तय किया गया था, वही अब ३९ में बेचना पड़ रहा है। ऐसी और कपड़ा उद्योग से जुड़ी अन्य कई खबरें भारत टेक्स्टाइल वाले दे रहे हैं। लेकिन खरीद फ़रोख्त की सुविधा में हिन्दी नौ दो ग्यारह है।

रेडियो रूस

अगर कोई रूस को अन्य देशों के साथ उस के फ़ौजी तकनीकी सहयोग घटाने पर मजबूर करने की कोशिश करेगा तो यह कोशिश असफल होगी। - व्लादिमिर पुतिन। ऐसे दमखम वाले रूस को नौ दो ग्यारह करना आसान काम नही है। पोदकास्त भी हैं :) - इस विज्ञापन में ही कुछ वर्तनी की गलतिया हैँ, वरना स्थल एकदम पाक-साफ़ है।

28.11.07

दैट्स हिन्दी

इनके चिट्ठे वाले वर्ग की तो बात ही निराली है - अपने स्थल पर अलग फ़्रेम में जालस्थल दिखा रहे हैं - बिना अनुमति के - पर उसके अलावा बाकी वर्ग तो पसंद आए। वैसे इस अग्रेज़ीमय हिन्दी स्थल की तो नुक्ताचीनी हो चुकी है, पर मुझे हॉलीवुड वाली तस्वीरें खास पसंद आईं। नो नो, दैट्स अंग्रेज़ी - हिन्दी इज़ नौ दो ग्यारह!

एक लैपटॉप प्रति बच्चा

आप चाहें तो बच्चों के हिसाब से अनुवाद कर सकते हैं या मौजूदा अनुवाद सुधार सकते हैं। पहले रवि ने भी उल्लेख किया था इसका, अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।

26.11.07

९-२-११ की टिप्पणी नीति

नौ दो ग्यारह पर आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। यदि आप यहाँ टिप्पणी करते हैं या उनका पुनरुपयोग करते हैं तो इन नीतियों के अधीन करें -
  1. कृपया व्यक्तिगत आक्षेप या गाली गलौज न तो करें और न ही उसपर प्रतिक्रिया करें।
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  1. यदि आपको मेरे नाम से या कोई बेनामी टिप्पणी यहाँ या कहीं और मिलती है तो पहले मुझसे पुष्टि कर लें कि यह वास्तव में मैंने ही की है या नहीं। मैं बेनामी या किसी और के नाम से टिप्पणियाँ नहीं करता।
  2. मेरे द्वारा यहाँ या अन्यत्र लिखित टिप्पणियों का पुनरुपयोग या पुनर्प्रकाशन मुझसे अनुमति ले कर ही करें।
यदि आपके इस नीति संबंधी कोई प्रश्न हों तो कृपया टिप्पणी के जरिए पूछ लें :)

22.11.07

कंप्युत्रिका

कंप्यूटर के बारे में पत्रिका - क्या क्या देखना चाहेंगे आप इसमें? बताएँ, सत्रारंभ करके। कच्चा खाका। और चर्चा करना चाहें तो दीवान डाक सूची की सदस्यता भी ले सकते हैं। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।

20.11.07

पतले होने का नुस्खा?

घर आँगन और दादी के नुस्खे में अभी तक यह नहीं बताया गया है कि पतला होने के लिए कौन सा मेवा कितने दिन, कितनी बार चबाया जाए। दरअसल मेरी कमर की गोलाई ३६ इंच हो चुकी है। केवल दो पतलून पहन पा रहा हूँ, उनमें से एक तो इसी इतवार को ली है। खाने में समोसे, पीत्ज़ा, मक्खन, पकौड़े, कचौड़ियाँ, चीज़ी गार्लिक ब्रेड(खोज में कहीं नहीं मिली!), दोसा, शाही पनीर, आलू टिक्की, पनीर टिक्का सब को नौ दो ग्यारह कर दिया है। दिन में कम से कम एक घंटे चलता हूँ। ब्रेड पकौड़े भी नहीं खा रहा और छोले भटूरे भी नहीं। हो जाएगा एक इंच प्रति माह के दर से घटाव? वैसे दादी की पोती को वर्तनी ठीक करने के उपाय भी अपनी दादी से पूछने चाहिए।

18.11.07

बारिश की खुश्बू की ताज़गी

चिट्ठों की भीड़ में अपनी पहचान बना पाना आसान नहीं है, आज का ताज़ा चिट्ठा कल का बासी बन के नौ दो ग्यारह हो जाता है। ऐसे में एक चिट्ठा सौरभ पाण्डे का - बारिश की खुश्बू - भा गया। सोचा कि क्यों भाया - शायद इसलिए कि एक तो उनकी हिंदी पाक-साफ़ है, और दूसरा उनके लेखन में उनका व्यक्तित्व झलकता है, ऐसा नहीं लगता कि किसी को चमत्कृत करने के लिए लिख रहे हैं। वैसे तिरुपति-शैली की धर्मांधता (और वैष्णो देवी शैली की भी) के बारे में मेरे विचार भी काफ़ी तीखे हैं, आप तिरुपति न जा पाए तो परेशान न हों! वहाँ जाना हिमालयन कार रैली का रोमांच तो दे देगा, पर यदि वास्तव में आध्यात्मिक उन्नति चाहिए तो अपने घर के एक कोने में उतना ही समय बिताना संभवतः अधिक लाभ देगा।

17.11.07

गुरुजी पर गुरुजी खोजिए + ब्लॉगर से हिंदी गायब

गुरुजी का हिंदी जालस्थल तो शायद पहले से ही था पर मैंने आज ही देखा। खोज करने पर पहला पन्ना काफ़ी धीरे आया पर परिणाम अच्छे हैं। अधिकतर भारतीय स्थल, जैसा कि गुरुजी कहते हैं। और मज़ेदार बात थी कि इनकी हिंदी काफ़ी अच्छी है, अनूदित सी नहीं लगती। इस बीच ब्लॉगर से हिंदी का विकल्प ही नौ दो ग्यारह हो गया है ऐसा लगता है। जब तक वापस नहीं आता है तब तक जापानी ही झेलो। ब्लॉगर-हिंदी-में-नहीं मतलब, ब्लॉगर का स्थल तो हिंदी में है, पर ब्लॉग्स्पॉट पर प्रकाशन का हिंदी वाला विकल्प ही गायब है। ब्लॉगर-हिंदी-में-पर ब्लॉग्स्पॉट नहीं शायद इस त्रुटि को ठीक कर रहे हों, कुछ समय बाद फिर वापस आजाए।

16.11.07

एक जापानी की यूनिकोड तालिका

जापानी और जापानियों की चर्चा हो ही रही है तो एक जापानी, रिचर्ड इशिदा - की बनाई इस तालिका को ही देख लें। अगर कहीं खाली डब्बे दिख रहे हों तो - "Show as graphics" पर सही का निशान लगाने पर ही सारे अक्षर दिखेंगे। अब इसमें 97D पर जो हँसिया बना है, वह क्या अक्षर है, समझ नहीं आया। उसके ऊपर नीचे के दो दो अक्षर तो शायद सिंधी और कश्मीरी में काम आते हैं। हाँ, वैदिक संस्कृत में स्वर/लय के लिए व्यंजन के ऊपर का खड़ा डंडा और व्यंजन के नीचे लेटा डंडा कहीं नहीं दिख रहा तालिका में, शायद यह इससे संबंधित हो? इस वाली तालिका में देखने से पता चला कि इसका नाम DEVANAGARI LETTER GLOTTAL STOP है। बस स्टॉप तो सुना था, पर ग्लोट्टल स्टॉप क्या है, शायद हरिराम जी बता पाएँ। हम होते हैं नौ दो ग्यारह, सायोनारा।

खोदा जापान मिले होटल और तस्वीरें और नेपाली

कल के लेख के बाद जापान के बारे में थोड़ी और खोज करते करते कुछ और अच्छे स्थल मिले - द वर्ल्ड इन फ़ोटोज़ और प्लानिगो - रोज कि दुनिया से तंग आ गए हों तो जमा पूँजी यूरोप घूमने लगाइए और तस्वीरें खींचिए। यह भी पता चला कि जापान में नेपाली लोग काफ़ी संगठित हैं। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह रोज़ की दुनिया में प्रवेश करने के लिए। रोज या रोज़?

15.11.07

आगे बिल्लू, पीछे सेब

खबर यह है कि बिल्लू सेब को नहीं खा रहा, बल्कि सेब आगे दौड़ रहा है और बिल्लू पीछे। जापान में पिछले महीने, यानी अक्तूबर २००७ में ५४% सेब बिके हैं। यानी नए कंप्यूटर खरीदने वाले आधे से ज़्यादा वहाँ सेब खा रहे हैं। इससे कई बाते सामने आईं -
  1. जापानियों के पास बहुत पैसा है।
  2. जापानी लोग ओम शांति ओम, साँवरिया जैसी सड़ी फ़िल्मों के बजाय वास्तव में कलात्मक चीज़ें पसंद करते हैं
  3. यह खबर सुन कर ब्लॉगर इतना खुश हुआ कि हिंदी की तारीखें भूल गया। ब्लॉगर-हिंदी-त्रुटि बदल कर जापानी करनी पड़ी, सेटिंग्स -> प्रारूपण में जा कर। ब्लॉगर-जापानी
पर लाख बात की एक बात। बिल्ली से तेज़ तो तेंदुआ ही भागेगा न। तभी तो अक्तूबर में बिके कुल कंप्यूटरों में से १०० में ५४ तेंदुए ही बिके जापान में, मत्सु जी आजकल नौ दो ग्यारह हैं पर बिल्लू को पीटने पर उनको बधाई।

12.11.07

इण्डलिनक्स वालों की गपशप १३ नवंबर २००७ को

यह गपशप irc.freenode.net पर होगी, #indlinux पर। चर्चा के विषय वही होंगे जो आमतौर पर इण्डलिनक्स में होती है, बस डाक के बजाय थोड़ी और तुरत फुरत। यदि आपको यह न पता हो कि आईआरसी क्या होता है, तो यह ऍचटीटीपी या ऍफ़टीपी की तरह का ही एक और शगूफ़ा है। बंगलोर में पहली बार देखा था - कई साइबर कैफ़ों में रहता था। आजकल नौ दो ग्यारह हो चला है। आईआरसी के यूआरएल भी होता हैं, जो कि irc:// से शुरू होते हैं। जैसे ऍचटीटीपी मूलतः ८० का इस्तेमाल करता है, वैसे ही आईआरसी ६६६७ का इस्तेमाल करता है। और हाँ, इसमें से अधिकतर जानकारी यह लेख लिखने के पहले मुझे भी नहीं थी। विंडोज़ के जरिए शामिल होना चाहें तो ऍमआईआरसी का इस्तेमाल करें, लिनक्स के जरिए शामिल होना चाहें तो ऍक्स-चैट का इस्तेमाल करें, और सेब के जरिए, पता नहीं, कभी आजमाया नहीं। कल आजमाता हूँ। तो मिलते हैं, irc://irc.freenode.net#indlinux पर, रात नौ से ग्यारह हिंदुस्तानी समयानुसार।

7.11.07

खबर एक्स्प्रेस

बीकानेर से छपी। पर पाठकों ने टिप्पणी अंग्रेज़ी में की है। फ़िल्म समीक्षा वाला हिस्सा खास पसंद आया। धनतेरस की खोज करते करते यह मिला।

टिप्पणियाँ नहीं दिख रही हैं

इस चिट्ठे पर ताज़ी टिप्पणियाँ नहीं दिख रही हैं, पर वह मौजूद हैं, नौ दो ग्यारह नहीं हुई हैं। यदि किसी को ऐसी समस्या आई हो तो बताएँ समाधान क्या हो सकता है। टिप्पणियों की मध्यस्थता लागू नहीं है। आप जवाब टिप्पणी से दे सकते हैं, यहाँ नहीं दिखेंगी पर मुझे डाक से तो मिल ही जाएँगी। शुक्रिया :)।

6.11.07

नोट का ब्लॉग और माले

हिंदी वाले ब्लॉगर को आपने देखा होगा तो नोट का ब्लॉग और माले के बारे में तो जानते ही होंगे। पर अगर नहीं, तो जान जाइए अब। ये है नोट का ब्लॉग। ब्लॉगर नोट का ब्लॉग यानी ब्लॉग्स ऑफ़ नोट। करारे नोटों वाले नहीं, वरन उल्लेखनीय चिट्ठे :) और यह लिंग माले में है - वह भी बिना वीज़ा के। ब्लॉगर माले गूगल भइया को इसके बारे में संदेश लिख दिया है। देखते हैं कितनी जल्दी ठीक होता है।

2.11.07

हिंदी जाल जगत, २००२ में, और आज पाँच साल बाद

सन २००५ में ली गई यह छवि, लिनक्स शब्द की खोज के ५८१ परिणाम दिखाती है। गूगल से लिनक्स के परिणाम और अब अगर यही खोज करेंगे, तो आते हैं लिनक्स के १२,२०० परिणाम। यानी दो साल में २१ गुना बढ़ोतरी। उसी तरह, नौ दो ग्यारह की खोज करने पर आज २०,२०० परिणाम मिले। २००२ या २००३ में २५ परिणाम मिले थे। गूगल से नौ दो ग्यारह के परिणाम पाँच साल के अंदर २५ और २०,००० में तो पूरे ८०८ गुना का फ़र्क है। है न दिलचस्प बढ़ोतरी हिंदी के स्थलों की? या हो सकता है गूगल ने अपनी खोज सुधार ली हो :) शायद दोनो ही हुए हैं। वैसे उन दिनों हिंदी खोज के लिए क्या शब्द डालें ताकि गूगल खाली हाथ न लौटे, यही सोचने में दिन के एक दो घंटे जाते थे। तारीखें ठीक करवाने के लिए अमित जी का शुक्रिया। कोई और त्रुटि हो तो बताएँ, आपका आभारी होऊँगा।

1.11.07

दावा

Review My Blog at HindiBlogs.org बस यही नहीं समझ आता कि अपनी ही चीज़ के लिए बार बार दावा क्यों ठोंकना पड़ता है। वैसे हिंदी ब्लॉग्स की शक्लोसूरत इतनी बढ़िया है कि नौ दो ग्यारह होने का मन ही नहीं करता। मैं वहाँ कम से कम २० मिनट तो बिता ही चुका हूँ। बस ऊपर तस्वीर में जो लिखा है वह हिंदी में होता तो मज़ा आ जाता।

30.10.07

ब्लॉगवाणी के चरित्र पर कुछ गंभीर बातें

यहाँ पर मैं सिलसिलेवार, पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ। पूरी बात शुरू से बता रहा हूँ क्योंकि यह सार्वजनिक महत्व का विषय है। सार्वजनिक महत्व का विषय क्यों है, वह भी बताऊँगा। १. चिट्ठाजगत-संकलक की एक नई सुविधा के ऊपर एक लेख छपा। २. उस पर कुछ टिप्पणियाँ हुईं, वह भी ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो पहले कभी इस तरह की चर्चाओं में शामिल होते दिखे भी नहीं थे। आखिर १००० चिट्टे होने के बाद भी चिट्ठाजगत अभी बहुत बड़ा तो नहीं है। आश्चर्य हुआ कि यह सब लोग कौन हैं, और सभी एक ही राग कैसे अलाप रहे हैं। वह भी बहुत कम अंतराल में ही एक के बाद एक टिप्पणियाँ, और सब में वही मत। कुछ शक हुआ, सभी एक ही व्यक्ति तो नहीं हैं? ३. इस घटनाक्रम के ऊपर इस चिट्ठे पर एक प्रविष्टि लिखी। ४. कुछ दिन पहले मेरा यह ९ २ ११ वाला चिट्ठा ब्लॉगवाणी पर दिखना बंद हो गया। घटनाक्रम पर प्रविष्टि इसी चिट्ठे पर लिखी गई थी। ५. मैंने कुछ मित्रों से पूछा, कि क्या हो सकता है, कि यह चिट्ठा ब्लॉगवाणी पर दिखना बंद हो गया, क्या उनके साथ भी यही समस्या आई है, सुझाव दिया गया कि लिख के पूछ लें। ६. उन्हें डाक लिखी। लिखा, कि मेरा चिट्ठा दिखना बंद हो गया है। कृपया बताएँ कि ऐसा क्यों है। ताकि शायद यदि कोई तकनीकी खराबी की वजह से ऐसा है तो ठीक हो जाए। उनके स्थल पर डाक पता था, सो लिखा। ७. कोई जवाब नहीं आया। ८. इस बीच कुछ लोगों ने इस बारे में प्रविष्टियाँ लिखीं। कुछ ने तटस्थ भाव से लिखीं, कुछ ने कोक-पेप्सी की तुच्छ लड़ाई के रूप में। कुछ ने ब्लॉगवाणी से जवाबदेही की माँग की। ९. फलस्वरूप, अभिनव (वही टिप्पणियाँ करने वाले) ने अपने चिट्ठे पर लेख छापा जिसमें यह लिखा था कि अभिनव ब्लॉगवाणी के संचालकों के परिवार के सदस्य हैं। पहली बार यह बात सार्वजनिक हुई। ब्लॉगवाणी पर या अभिनव जी के चिट्ठे पर इसका कोई उल्लेख इसके पहले नहीं था। १०. इस बीच दो अन्य चिट्ठाकारों से फ़ोन पर बात हुई और उन्होंने कहा कि वे पता लगाते हैं कि हुआ क्या है। पता लगाया गया, और जवाब यह मिला कि चिट्ठाजगत से उनके परिवार के सदस्यों के चिट्ठे हटाए जाने की वजह से ऐसा हुआ है। और इस लेख से इस बात की भी पुष्टि हो गई कि यह तकनीकी खराबी की वजह से नहीं हटा है, बल्कि जानबूझ कर हटाया गया है। फिर कुछ लोगों ने बातचीत की, एक बार फिर उल्लेख हुआ कि चिट्ठाजगत-संकलक से ब्लॉगवाणी के संचालकों के परिवार के सदस्यों के चिट्ठे हटाए गए हैं, बहरहाल मेरा चिट्ठा वापस शामिल भी कर लिया गया। पूछा कि ये परिवार के सदस्य कौन हैं। पता चला कि {नूर मोहम्मद खान बनाम मैथिली गुप्त बनाम धुरविरोधी}, अभिनव, और सिरिल मैथिली गुप्त एक ही परिवार के सदस्य हैं और तीनो ब्लॉगवाणी से संबद्ध हैं। साथ ही अरुन अरोरा नामक एक सज्जन भी ब्लॉगवाणी से संबद्ध हैं। इनमें से कौन ब्लॉगवाणी का वास्तविक संचालक है, और किनकी क्या क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं, यह मुझे ज्ञात नहीं। नूर मोहम्मद खान, अभिनव, और सिरिल - ये तीन नाम सामने रख दिए जाएँ, तो क्या पता चलेगा कि ये तीनो एक ही परिवार के सदस्य हैं? न तो इनके चिट्ठों पर ऐसा कहीं लिखा है न कहीं और। अच्छा हुआ जो इस घटना क्रम से यह पता चल गया। यह सब तो थे तथ्य। अब नीचे मेरी राय है और कुछ सवाल भी। कल अरुण अरोरा जी की, जो ब्लॉगवाणी के संचालक दल में हैं, की यह टिप्पणी आई। तो लगा, यह क्या है? मेरे मन में अब कई सवाल उठ रहे हैं। यदि चिट्ठाजगत के रोमनीकरण पर ब्लॉगवाणी के संचालकों को विरोध था तो उन्होंने अपने नाम से विचार क्यों व्यक्त नहीं किए? कई छद्म नामों से क्यों ऐसा किया? यह अनैतिक है। क्या उन्हें इसके लिए क्षमा नहीं माँगनी चाहिए, क्या यह वादा नहीं करना चाहिए कि ऐसा वे पुनः नहीं करेंगे? पर अगर वादा किया भी तो क्या गारंटी है कि ऐसा फिर से नहीं होगा। मेरा चिट्ठा हटाने के लिए "पारिवारिक चिट्ठों" का हटाना क्या एक बहाना ही नहीं था? जब उस समय किसी को पता ही नहीं था कि अभिनव ब्लॉगवाणी संचालक दल में है तो यह आरोप कैसे लगाया जा सकता है? यह आरोप ही झूठा है, और केवल नौ दो ग्यारह को नौ दो ग्यारह करने का एक बहाना था। ३. इस टिप्पणी के आने का मतलब क्या है? यही न, कि इस प्रकार की कारस्तानियाँ चलती रहेंगी। इस टिप्पणी में एक अनैतिक बात है किसी निजी डाक को सार्वजनिक करने की धमकी। वह कर दें, मुझे आपत्ति नहीं है। पर यह अनैतिक है। मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा चाहे निजी डाक में सिर्फ़ हाल चाल ही पूछा गया हो, और जो व्यक्ति डंके की चोट पर ऐसा करने की धमकी देता है, उसकी नैतिकता स्पष्ट है, मैं उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहता। पर यह भी देखा कि इस टिप्पणी के विरोध में किसी ने कुछ कहा भी नहीं है। सब खुश हैं कि चिट्ठा जुड़ गया है। इस टिप्पणी पर ब्लॉगवाणी के संचालक ने आपत्ति क्यों नहीं की? क्या ब्लॉगवाणी के संचालक को मालूम है कि यह टिप्पणी की गई? या उन्हें मालूम था, पर उन्होंने कुछ कहना या करना ज़रूरी नहीं समझा? हिंदी जाल जगत के बाशिंदे क्या अब इस प्रकार के व्यवहार के आदी हो चुके हैं? क्या हम सबको यह सहज व स्वाभाविक लगता है? क्या ऐसे व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार नहीं होना चाहिए? जो संस्था ऐसे व्यक्ति को पाल रही है क्या उसका सामाजिक बहिष्कार नहीं होना चाहिए? मुद्दा कभी चिट्ठा जुड़ने का था ही नहीं। मेरा तो केवल प्रश्न था कि चिट्ठा नहीं दिख रहा है, कारण क्या है। जुड़ना, न जुड़ना तो बाद की बात थी। यह स्पष्ट हो गया है कि चिट्ठा जानबूझ के हटाया गया है, किसी तकनीकी खराबी की वजह से नहीं, न ही आपत्तिजनक सामग्री की वजह से। अब ब्लॉगवाणी से हट के कुछ और सार्वजनिक हित की बातें करते हैं। इस पूरे प्रकरण में मुझे कुछ और जानकारियाँ मिली हैं जो आपके काम की हो सकती हैं। उनको मद्देनज़र रखते हुए आप से सार्वजनिक रूप से यह अनुरोध है। १. यदि आपको कोई नकली पहचान मिलती हैं, तो सावाधान रहें, और ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करें। २. यदि आपको कोई प्रायोजित चिट्ठे मिलते हैं तो सावधान रहें और ऐसी जानकारी सार्वजनिक करें। ३. यदि आपको पता चलता है कि आपके नाम से फ़र्ज़ी डाक भेजी गई है तो घटना को सार्वजनिक करें। यह दंडनीय अपराध है। कृपया ऐसी परंपरा का प्रारंभ न करें कि किसी के नाम से फ़र्ज़ी डाक पाना रोज की बात हो। फ़र्ज़ी डाक का स्रोत पता लगाना मुश्किल नहीं है। ऐसी कोई भी घटना पुनः होती है तो आप मुझे बताएँ। यदि आप सार्वजनिक न करना चाहें तो मैं करूँगा। ४. किसी अन्य चिट्ठाकार की बुराई करने के लिए लिखने का अनुरोध पाने पर उसे अस्वीकार करें, चाहे कितने पैसे दिए जा रहे हों। साथ ही इसे सामने लाएँ, सार्वजनिक करें। ऐसे कामों के लिए कभी पैसे न लें न कोई सहायता लें। यह केवल वातावरण दूषित करता है। ५. किसी के भड़काने में न आएँ। तथ्यों की खुद खोजबीन करें। यदि फिर भी शक हो तो थोड़ा ठहरें, हवा साफ़ होने दें। "भेड़िया आया" के पहचानें और फिर उन्हें नज़रंदाज़ करें। चलिए अब वापस ब्लॉगवाणी पर आते हैं। जिस स्थल की चिट्ठे शामिल करने और निकालने का कोई हिसाब ही न हो, और जो इस प्रकार की दूषित नीतियाँ अपनाता है, क्या उसपर भरोसा करेंगे? क्या आप उसको मान देंगे? सिर्फ़ इसलिए कि वह हिंदी में है? ध्यान दें, यह आक्षेप स्थल की नीतियों पर है, व्यक्तिगत नहीं है। स्थल की सामग्री के आधार पर या चिट्ठे के स्वामी के आधार पर जब चिट्ठों को हटाया जा रहा है, तो क्या आपको स्वीकार्य है? चिट्ठे की सामग्री में कोई समस्या नहीं है। क्या ऐसा ही हो आपका संकलक? क्या आपको लगता है कि यह छोटा सा मामला है? मुझे नहीं लगता, क्योंकि मैं चरित्र को महत्व देता हूँ। मेरे लिए हिट्स पाना ज़रूरी है, लेकिन वह तो मैं अंग्रेज़ी लिख के भी पा सकता हूँ। अब तक मैं यह मान के चल रहा था कि यदि कोई हिंदी में अंतर्जाल पर कुछ शुरू करता है तो वह सुचरित्र ही होगा। पर पता चल गया कि ऐसा नहीं है। मैं यदि किसी स्थल या परियोजना से जुड़ूँगा तो इस प्रकार की आचार संहिता के अधीन ही। अब तक यह मौखिक थी, अब लिख दी है ताकि किसी को शंका न रहे। मेरी कोई आर्थिक मजबूरियाँ नहीं जिनके चलते मुझे अपना आचार बदलना पड़े। अतः मैं ब्लॉगवाणी का बहिष्कार कर रहा हूँ। कोई अकेला खुराफ़ाती होता तो बात अलग थी, मैं नज़रंदाज़ ही करता, पर यह संस्थागत है। उनकी इच्छा है, मेरा चिट्ठा रखें या न रखें। मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। न रखें तो शायद उनके लिए बेहतर होगा, क्योंकि मैं अनैतिक चीज़ों का खुलासा यहाँ करता ही रहूँगा। मुझे पता है कि यदि ब्लॉगवाणी से संबंध रहे तो ऐसे प्रकरण दुबारा होंगे, क्योंकि यह दोष संचालन का है। या तो मुख्य संचालक को पता ही नहीं है कि चल क्या रहा है, या सब संचालक की जानकारी में रहते हुए हो रहा है। मुझे ऐसे स्थल पर आस्था नहीं है। मुझे नहीं लगता कि वह मेरे लिए उपयोगी होगा। इतना ही नहीं मुझे तो लगता है कि इससे हिंदी जाल जगत को बहुत बड़ा नुकसान होगा। हाँ. यदि मेरे ब्लॉगवाणी के साथ कोई आर्थिक संबंध होते या वित्तीय रूप से उनपर आश्रय होता तो यह ज़िल्लत ज़रूर झेलता। पर मुझे यह करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम जितना झेलेंगे, उतना ही ये झिलाएँगे। हम क्यों झेलें? क्या आप घर और काम से समय निकाल कर इसलिए अंतर्जाल पर आते हैं कि ज़लील किए जाएँ? क्यों अपनाऊँ इन्हें मैं? सिर्फ़ इसलिए कि वे हिंदी में लिखते हैं? नहीं, यह मेरे लिए काफ़ी नहीं है। साथ ही कुछ और अनुरोध। १. यदि आपको मेरे नाम से कोई डाक मिले तो उसका उत्तर दे कर पहले पुष्टि कर लें कि क्या वह वास्तव में मैंने भेजी है या नहीं। यदि आपको मेरे नाम से डाक मिलती है तो कृपया मूल रूप मुझे भेजें। मैं प्रेषक के खिलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही करूँगा। २. मैं इस प्रकरण में और आगे भी कभी किसी फ़र्ज़ी पहचान या बेनामी पहचान से कोई टिप्पणी नहीं करूँगा। यदि आपको मेरे नाम की कोई टिप्पणी मिलती है और वह भड़काऊ है तो एक बार मुझसे पुष्टि कर लें कि क्या वास्तव में वह मैंने ही लिखी है क्या। ३. मैं किसी भी व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करूँगा और न ही किसी व्यक्तिगत आक्षेप का जवाब दूँगा, क्योंकि इससे मुख्य गंभीर मुद्दे पर रायता फैलता है, इसलिए नहीं कि मैं जवाब दे नहीं सकता। मैं भी पंजाब में रहता हूँ, गालियाँ तो मुझे भी आती हैं। उपरोक्त सभी आक्षेप ब्लॉगवाणी के संचालन प्रणाली पर हैं, किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं। कृपया टिप्पणी करें तो ब्लॉगवाणी की संचालन प्रणाली पर करें, व्यक्तियों पर नहीं। तो आप सोच लें, क्या आप किसी भी जालस्थल के अनैतिक व्यवहार - को बढ़ावा देना चाहते हैं? जैसा कि मैंने पहले कहा था, सिर्फ़ हिंदी में लिखते हैं, मात्र यह कारण मेरे लिए संबंध जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। स्थल का सौंदर्य, उसकी धड़ाधड़ता के पहले उसका चरित्र है। वह सामने आ ही गया।

28.10.07

आ गई मैशियत

श्रीश की बदौलत। वैसे अभी तक हम दोनो को ही समझ नहीं आया है कि यह है क्या। यदि आपको न्यौता चाहिए हो तो लिखें। शुक्रिया, श्रीश

नई डाक सूची - टेक्निकल हिंदी

हिंदी की वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली से संबंधित चर्चा के लिए डाक सूची। क्यूँकि यह भारत सरकार के राजभाषा विभाग के बजाय अनुनाद जी द्वारा जनित व संचालित है, अतः इसके नौ दो ग्यारह होने के बजाय सफल होने की संभावना अधिक है :) मूल घोषणा सदस्य बनें, और शामिल हों।

25.10.07

शीरमाल और टिप्पणी कूट

यूँ तो मैं लखनऊ का रहने वाला हूँ पर कभी वहाँ रहा नहीं, इसलिए शीरमाल और बाकी रोटियों के बारे में कुछ खबर न थी। अगली बार जाने पर हाथ साफ़ करने हैं। वैसे टिप्पणी कूट के आधार पर एक अच्छा खासा विजेट बन सकता है। वैसे पैंगो या गार्गी, पता नहीं किसमें, यह त्रुटि मिली है कि सन्देश को स्नदेश की तरह दिखाता है। त्रुटि की पहली छवि त्रुटि की दूसरी छवि पिछले आठ घंटे की प्रविष्टियों पर टिप्पणी करने में पूरे दो घंटे लगे। दाद देता हूँ समीर लाल जी को, और होता हूँ नौ दो ग्यारह।

24.10.07

तेंदुआ आ रहा है

छोटा वीडियो (100 मेबा), बड़ा वीडियो या फिर यूट्यूब पर। कल ही दो किलो सेब लाया था, मोहाली में सिक्सटेन नामक नई दुकान से। होता हूँ नौ दो ग्यारह, खाने जो हैं।

23.10.07

ज़ेडमैग

हिंदी में कई समाजशास्त्रियों के लेख। इनमें नोम चोम्स्की का एक लेख भी है, जो कि काफ़ी अच्छा है। वैसे भाषाविद् चोम्स्की ने यह खोज भी की थी कि लगभग सभी भाषाओं के मूल स्वर एक से ही हैं। इसके लिए कई भाषाओं के शब्दों को एक इलेक्ट्रानिक गागर में डाल के मिश्रित करने के बाद ध्वनियों का विश्लेषण किया गया था।

22.10.07

याहू मैश का न्यौता

कोई भेज सके तो कृपा होगी। भेजने के बाद टिप्पणी चेंप दें ताकि बाकियों के न्यौतों की बचत हो। फिर हम हो जाएँगे वहाँ नौ दो ग्यारह

16.10.07

जोश मलीहाबादी के बाद जोश १८

जगदीश भाटिया बता रहे हैं कि सीएनबीसी ने जोश १८ शुरू किया है। वैसे समाचार के पोर्टल इतने बासी बासी क्यों लगते हैं? हाँ, फ़ॉंण्ट को फान्ट लिखा है, और शेखचिल्ली की हिंदी ब्लॉग नाम से एक कड़ी भी है। तो आप देखिए जोश अठारह पढ़ें और शेखचिल्ली को बधाई दें, गरमचाय का जमाव बहुत पसंद आया, मैं होता हूँ नौ दो ग्यारह।

5.10.07

पाँच दिल एक जान

अभिनव दिनेश शुक्ला नूर मोहम्मद खान सिरिल गुप्ता या, एक जान, चार आई डी? चारों चिट्ठाजगत-संकलक के रोमन संस्करण पर ऐसे टूट पड़े कि इस जालस्थल के लिए यह स्ट्राइसैण्ड प्रभाव से कम नहीं था। साथ ही पाँचवी आईडी शिल्पा शर्मा जी भी कुछ कह देतीं तो सोने पर सुहागा हो जाता। आप पाँचों का, या आप वास्तव में जितने भी हैं, इस निःशुल्क सेवा के लिए धन्यवाद। हम सोच रहे थे कि सब कुछ तैयार होने पर आधिकारिक चिट्ठे पर घोषणा करेंगे, लेकिन इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी! अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह, लेकिन जाने के पहले एक बार फिर शुक्रिया!

25.8.07

जीमेल की चिप्पियों और भंडारण का नुकसान

जिस प्रकार टीवी में रिमोट होने की वजह से कसरत कम होती है, उसी प्रकार जीमेल की चिप्पियों और भंडारण के भी मुझे कुछ नुकसान झेलने पड़े हैं। देखिए। जीमेल-चिप्पियाँ हाँ, नीचे और भी हैं। इतनी अपठित इसलिए रह गईं क्योंकि मेरी छन्नियाँ इस प्रकार की हैं कि चिप्पी लगाने के साथ साथ, इन संदेशों के लिए इनबॉक्स छोड़ें का विकल्प भी चुना गया था। जीमेल-इनबॉक्स-छोड़ें नतीजा यह कि चिप्पियों में तो अपठित डाक की संख्या लगातार बढ़ रही थी, लेकिन डाक खोलने पर डाक पेटी में संदेश इक्का दुक्का ही रहते थे। साथ ही, ज़्यादा डाक इकट्ठी करने से जीमेल को कोई दिक्कत नहीं है। याहू डाक की तरह ऊपर लाल खतरे का निशान नहीं आता है। साथ ही, अगर चिप्पियाँ ज़्यादा हों तो डाक खोलने पर सामने सामने अपठित की संख्या नहीं दिखती है, क्योंकि वह नीचे छिप जाती हैं। तो जिस प्रकार दीमक अंदर ही अंदर से लकड़ी को खोखला कर देती है, उसी प्रकार, मेरे अपठित संदेशों की संख्या हज़ार के करीब पहुँच गई। यह सब पिछले छः महीने में हुआ। इसके मुझे कई खामियाजे भी भुगतने पड़े हैं - चिप्पी तो लगी है, अब एक-एक चिप्पी से शुरू करें तो आप शायद दूसरी चिप्पी लगी ताज़ी - और शायद ज़्यादा ज़रूरी डाक - को देर से पढ़ें। इसका आज एक निदान सोचा। पहले तो सभी छन्नों से "इनबॉक्स छोड़ें" का विकल्प हटा दिया। इससे चिप्पी तो लगी रहेगी, लेकिन समयक्रम के अनुसार नए संदेश डाकपेटी में भी दिखेंगे। दूसरा, हर चिप्पी के अपठित संदेशों को वापस डाकपेटी में ले आया। जीमेल-इनबॉक्स-में नतीजा यह हुआ कि चिप्पियों के तहत अपठित तो हैं ही, साथ ही डाक पेटी में भी संख्या आ गई है, और सारी अपठित डाक नज़रों के सामने समयक्रम के अनुसार दिख रही है। जीमेल-इनबॉक्स-डाकपेटी तो थोड़ी सुविधा तो हो ही गई है। वैसे मैं ज़रूरत से ज़्यादा लापरवाह हूँ, पर यदि आपको इसी प्रकार की समस्या हो - डाक पढ़ना टरकाने की - तो मेरा सुझाव है कि चिप्पियाँ तो लगाएँ, लेकिन संग्रहीत न करें। साथ ही कुछ मीन मेख। आप देखेंगे कि तारांकित ठीक से नहीं लिखा आया है। इसी तरह यहाँ ज़बर्दस्ती खिंचाव पैदा किया गया है - जीमेल-खिंचे-पते गूगल वालों को चिट्ठी लिखनी पड़ेगी। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।

21.8.07

प्रेमचंद की ओट में शिकार

देखो, शब्द कहीं से लो, अरबी, फारसी, पंजाबी, गुजराती, अंग्रेजी कहीं का हो, ख्याल रहे कि ख्यालात का तसब्बुर और ज़वान की रवानगी ........ भाषा की प्रवहमानता और विचारों का क्रम बना रहे। - —प्रेमचन्द [उपेन्द्रनाथ अश्क को लिखे पत्र से साभार] तसव्वुर, रवानगी - शूँ छे? विचार कुंज से साभार।

4.8.07

हिन्दी का डिग - हिन्दीजगत्

कुछ दिनो पहले मैंने डिग पर हिन्दी का एक लेख प्रकाशित करने की कोशिश की। लेकिन हिन्दी का लेख नहीं छाप पाया - शीर्षक में हिन्दी स्वीकार्य नहीं था, या ऐसी ही कोई समस्या। डिग पर लोगबाग अपनी पसन्द की खबरें - यानी जालस्थलों के पन्नों की कड़ियाँ - प्रस्तावित करते हैं, और फिर यदि और लोगों को पसन्द आती हैं, तो वे उनके बगल में मौजूद लघु छवि पर चटका लगा के घोषित करते हैं कि उन्हें पसन्द आईं। इस प्रकार पहले पन्ने पर हमेशा सबसे लोकप्रिय खबरें होती हैं, अगले पर उससे कम, आदि आदि। यह क्रम लगातार बदलता रहता है, नई खबरों के आने और लोगों की राय के अनुसार। तो बात हो रही थी कि डिग पर हिन्दी के लेख नहीं छाप पा रहा था। फिर परसों मुझे मिला हिन्दी जगत् - यह लगभग हिन्दी का डिग ही है। आप भी आजमा के देखें। <जोड़ा> देख रहा हूँ इसे डालने से क्या होता है - Save This News! </जोड़ा>

31.7.07

शब्दकोष, गूगल पट्टी में

अक्षरमाला मञ्च की यह चर्चा बता रही है कि http://toolbar.google.com/buttons/add?url=http://www.aksharamala.com/e2h.xml पर चटका लगाने से आपकी गूगल उपकरण पट्टी में यह शब्दकोष बस जाएगा। फिर, किसी भी अङ्ग्रेज़ी शब्द का हिन्दी अनुवाद पाने के लिए गूगल पट्टी में शब्द प्रविष्ट करें और पट्टी पर नए पैदा हुए "हि" पर चटका लगाएँ।

गूगल अक्षरमाला

चटका लगाने से सीधे परिणाम पृष्ठ पर पहुँचेंगे, जहाँ शब्दार्थ मिलेगा। इसी प्रकार की सुविधा तेलुगु के लिए भी उपलब्ध है। फ़ायर्फ़ोक्स के दाएँ कोने वाले खोज बक्से में चीज़े जोड़ने के लिए भी ऐसा ही कुछ करना होता है, याद नहीं क्या।

30.7.07

सैल गुरु

यूँ तो वैसे ही घर बार से सम्बन्धित हिन्दी में जालस्थल बहुत ही कम हैं, अतः सॅल फ़ोनों व उनके सहायक उपकरणों से सम्बन्धित स्थल देख कर खुशी हुई। अक्सर दुकानों में जाने पर यह पूछने पर कि इस फ़ोन में हिन्दी है क्या? पहले तो लोग ऐसे घूरते थे जैसे कि लङ्गूर हूर खोज रहा हो, अब कम से कम दुकानदार लोग डब्बा अलट पलट के बता देते हैं, लेकिन फिर भी कई दुकान वाले डब्बा खोलने से इन्कार कर देते हैं अतः यह पता ही नहीं लग पाता कि फ़ोन में हिन्दी है या नहीं, और है तो किस हद तक। वैसे यह स्थल सामूहिक चिट्ठा भी बन सकता है, अब किसी भी एक व्यक्ति के पास सभी फ़ोन तो नहीं होंगे। पता नहीं ब्लॉगर में मध्यस्थता की सुविधा है या नहीं। वैसे टिप्पणियों में लिखा है कि हिन्दी की सुविधा के बारे में भी जानकारी दें।

23.7.07

फ़्लिकर वालों को लिखिए, उनकी हिन्दी खोज नहीं चलती है

फ़्लिकर, जो याहू की सम्पत्ति है, और तस्वीरें चढ़ाने और उनमें खोजने का जालस्थल है, हिन्दी की चिप्पियों और सामग्री में खोज ही नहीं कर पाती है। इसलिए उन्हें लिखा है, अङ्ग्रेज़ी में, पता नहीं उन्हें हिन्दी आती है कि नहीं।
देवनागरी की चिप्पियों पर खोज काम नहीं करती है। उदाहरणार्थ, इस चिप्पी बादल में मौजूद चिप्पियों को देखें। अब इनमें से किसी एक देवनागरी चिप्पी पर खोज करने की कोशिश करें - जैसे कि संयुक्तराज्य पर - खोज में कोई तस्वीरें नहीं दिखती हैं जबकि ऐसी सार्वजनिक तस्वीरें मौजूद हैं और यह खाता भी सार्वजनिक खोज के लिए मञ्जूर हो चुका है। मञ्च में खोज करने से पता चला कि यह समस्या आपको ज्ञात है। क्या आपने इसे ठीक करने के लिए किसी को लगाया है?
चीनी जापानी वालों को भी यह समस्या आई थी, पर उन्होंने लड़ झगड़ के, डरा धमका के इसे ठीक करवाया। लगता है कि देवनागरी के लिए भी यही करना पड़ेगा। पहले विनम्रता से। फिर और अधिक विनम्रता से :) यदि आप फ़्लिकर का इस्तेमाल करते हों और देवानागरी में खोज लागू करवाना चाहते हैं, तो कृपया सत्रारम्भ करके उनके मञ्च पर लिखें

19.7.07

ब्लॉगर का स्थल अब हिन्दी में

ब्लॉगर पहले ही १७ भाषाओं में उपलब्ध था, अब १९ और भाषाओं में आ गया है, और उनमें से एक है हिन्दी भी। मुबारक हो! हिन्दी में चिट्ठे तो पहले भी लिखे जा सकते थे, इसके जरिए आप ब्लॉगर के स्थल का इस्तेमाल भी कर पाएँगे, यदि केवल हिन्दी मालूम हो तब भी। लेकिन लगता है कि मुख पृष्ठ के अलावा और चीज़ों का अनुवाद अभी नहीं हुआ है। अरे नहीं, मैं गलत था। सत्रारम्भ करने के बाद यह पन्ना आता है, अङ्ग्रेज़ी में - ब्लॉगर डॅश्बोर्ड अङ्ग्रेज़ी में लेकिन इसी पन्ने पर बदल के हिन्दी किया जा सकता है - ब्लॉगर डॅश्बोर्ड हिन्दी में और यह रही इस बारे में गूगल की ओर से ही सूचना। तो इन्तज़ार किस बात का है? भाषा बदलिए और आनन्द लीजिए

11.6.07

पत्रकारों के चिट्ठे - स्वागतम् खबरियों!

बेचैन उत्साही, रवीश कुमार, मौतरमा खबरफ़रोश, इरफ़ान, मेरठ के सचिन जी, और अभय तिवारी - यानी जाल पर पत्रकारों के चिट्ठे। आपका स्वागत है। जाल पर पत्रकारों के और चिट्ठे हों तो उन्हें यहाँ प्रस्तावित किया जा सकता है, ताकि ये नेट्स्केप की निर्देशिका में प्रकट हो सकें। जो यहाँ पहले ही सूचित हैं वह अपना पता बदलने का अनुरोध भी कर सकते हैं, और कोई भी भला मानुस http://dmoz.org/World/Hindi/समाचार/प्रचार माध्यम/पत्रकारिता/पत्रकार वर्ग के सम्पादक बनने का आवेदन कर सकता है। मिड डे के इस लेख में इस बात की गन्ध आई कि लोगों को अचरज हो रहा है कि हिन्दी के पत्रकार अच्छा लिख सकते हैं। भई इसमें अचरज की क्या बात है। जो पत्रकारिता से पैसा कमाता है वह अच्छा तो लिखेगा ही। एक और जगह चर्चा हुई कि जाल पर लिखने वालों को अपनी औकात में रहना चाहिए साहित्य वाहित्य उनके बस की नहीं है। क्या पत्रकारिता साहित्य है? क्या चिट्ठा लिखना साहित्य है? क्या चिट्ठाकार पत्रकार है? वैसे तो यह केवल शब्द ही हैं, मुझे इन सवालों के जवाब नहीं पता। एक बहुत अच्छी शुरुआत, इस लेख में कई चीज़ें उत्तेजनात्मक हैं इसलिए बहुत हो गया, अब होते हैं हम नौ दो ग्यारह। मेरे हिसाब से इन चिट्ठों और गैर पत्रकारी चिट्ठों में फ़र्क ये हैं कि
  • ये पेशेवर पत्रकारों द्वारा लिखे गए हैं
  • इनके लेखों में वर्तनी और व्याकरण की गलतियाँ नहीं के बराबर हैं
  • भाषा में स्वाभाविकता है
  • एक मुँहफटपना है
  • लम्बे लम्बे लेख हैं, बिना अनुच्छेदों में विभाजन के, और बिना सन्दर्भों, और कड़ियों के
  • ख़ास विषयों को छू रहे हैं
  • और जोड़ें
  • 10.6.07

    अब पाक साफ़ बीयर हिन्दुस्तान में

    अचरज खबर पढ़ के भी हुआ, और गुलाबी अङ्ग्रेज़ी अखबार में हिन्दी का लेख देख कर भी। मन्थन चल रहा है कि किस बात को ले के ज़्यादा अचरज हुआ। मन्थन करते करते होते हैं अब नौ दो ग्यारह।

    8.6.07

    ८४ बोतल बियर व ७३ पव्वे

    बाड़मेर पुलिस यह बता रही है कि
    होटल मे से ६७ बोतल बियर, मोहन राम पुत्र सवा राम माली नि० सिन्धरी कि होटल मे ११ बियर व ४४ पव्वे अंग्रेजी शराब, मोहन सिंह पुत्र सुर सिंह राजपूत नि० खानोदा कि होटल से ५२ पव्वे अंग्रेजी शराब, दुदा राम पुत्र दुर्गा राम जाट नि० मन्नावास के घर से ५७ बोतल व २७ पव्वे अंग्रेजी शराब व ३ बोतल बियर मय एक पेकिंग मशीन, खगा राम पुत्र हर्जी राम जाट नि० पयला खुरद कि दुकान से ८४ बोतल बियर व ७३ पव्वे अंग्रेजी शराब बरामद kar थाना सिन्धरी पर आबकारी अधिनियम के तहत ५ मुकदमे दर्ज किये गए।
    बाकी सब तो ठीक है, पर kar को भी कर कर देते तो बढ़िया होता। बहुत ही सराहनीय प्रयास है। मई २००७ से ले के अब तक ब्यौरावर थाने की गतिविधियों का लेखाजोखा है।

    29.4.07

    मैं और मेरा सेब

    मैं और मेरा सेब - अक्सर यह बाते करते हैं, कि ये होता तो क्या होता, कि वो होता तो क्या होता। यह सेब इतना सुन्दर है कि सारे जालस्थल बदसूरत लगने लगे हैं, सो होते हैं हम नौ दो ग्यारह।

    11.2.07

    निरन्तर का नया अङ्क

    जाल पत्रिका निरन्तर का नया अङ्क छप गया है। चूँकि दो महीने बाद इसका दूसरा अङ्क यहाँ छप जाएगा, इसलिए दिसम्बर 2006 वाले अङ्क की कड़ी अलग से। दिलचस्प चीज़ यह है कि निरन्तर के जरिए आजकल माइक्रोसॉफ़्ट वाले गूगल को पैसा फेंक रहे हैं, अपने हिन्दी के स्थलों की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए। निरन्तर ऍडसेंस