7.5.08

विस्फोट विस्फोटित हुआ - ज़िम्मेदार कौन? संकलक या चिट्ठा लेखक या पाठक? - आप जवाबदेह हैं

ताज़ी खबर है कि विस्फोट नामका चिट्ठा जो कि सञ्जय तिवारी जी चलाते हैं, अब ध्वस्त हो चुका है, विस्फोटित हो चुका है।

 

स्थल पर कोई कारण नहीं लिखा है कि ऐसा वास्तव में क्यों हुआ। स्थल पर मात्र इतनी जानकारी है, कि विस्फोट का चिट्ठा अब स्थायी रूप से बन्द हो चुका है (जी हाँ, स्थायी, अस्थायी नहीं)।

 

इतना ही नहीं विस्फोट पर लिखे सभी लेख मिटा दिए गए हैं।

 

क्यों हुआ यह सब? जानने की कोशिश करते हैं।

 

विस्फोट प्रारम्भ में सञ्जय तिवारी जी का निजी चिट्ठा था। सामयिक विषयों पर, और खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के जन जीवन के बारे में यहाँ लिखे लेख कई लोग चाव से पढ़ते आए हैं।

 

कुछ दिनो पूर्व सञ्जय जी ने विस्फोट को साथिया चिट्ठे की शक्ल देने का फैसला लिया।

 

लिखने वाले दर्जनों तैयार हो गए। यह सञ्जय जी की मेहनत और स्वभाव का ही फल है कि इतने लोग अपने आपको विस्फोट से जोड़ना चाहते थे।

 

कई लोगों ने विस्फोट पर लिखना शुरू किया। लेखों की सामग्री में कुछ खास बदलाव नहीं था, न अश्लीलता, न गाली गलौज। प्रासंगिक विषयों पर लेख, पहले की ही तरह। संजय जी ने बहुत सोच समझ के ही साथिया चिट्ठे की सदस्यता के लिए आमन्त्रण भेजे। इतना ही नहीं, आमन्त्रण खुला रखा। साथ ही, विस्फोट के स्थल से सभी विज्ञापन भी हटा दिए, यह भी लिखा कि वे विज्ञापन महान बनने के लिए नहीं हटा रहे हैं, बल्कि इसलिए हटा रहे हैं कि सामूहिक चिट्ठे में आय का बँटवारा कैसे हो, यह फैसला करना संभव नहीं है। उनके इस कदम की भी सबने दाद दी।

 

एक दिन अचानक – एक निजी सङ्कलक पर - हिन्दी चिट्ठों के चार से अधिक संकलकों में से एक - पर विस्फोट दिखना बंद हो गया।

 

अब ब्लॉगवाणी के चरित्र के बारे में कुछ गम्भीर बातें तो मैं पहले ही कर चुका हूँ, लेकिन यह लेख किसी निजी संकलक की सम्पादकीय नीति के बारे में नहीं है। देखते हैं कि इस मसले में आगे क्या हुआ।

 

बतङ्गड़ पर एक लेख छपा। लेख में आह्वान था, कि ये एग्रिगेटर इस तरह के शर्मनाक धंधे कब बंद करेंगे? सही बात है, कि अकेली मछली पूरा तालाब गंदा करती है, गलती की एक एग्रिगेटर ने, गाली मिली सभी को।

उसपर निजी संकलक के सञ्चालक महोदय का खुलासा आया कि फलाँ कारणों से यह चिट्ठा हटा दिया गया है। ठीक है, उनकी मर्ज़ी, वह तो हैं ही स्वान्तः सुखाय। सुखी रहें।

 

पर उसके कुछ ही मिनट बाद यह लेख भी बतङ्गड़ से गायब हो गया।

इतना ही नहीं,  निजी संकलक से भी गायब हो गया।

निश्चित रूप से बतङ्गड़ से बतङ्गड़ महोदय ने हटाया होगा - सञ्चालक तो वही हैं,  कोई और तो है नहीं। और निजी संकलक से, निजी संकलक के सञ्चालक ने।

 

जब उड़ाना ही था, तो लेख लिखने की आवश्यकता क्या थी, लेकिन वह तो बतङ्गड़ जी ही जानें।

 

अगले दिन सञ्जय तिवारी जी ने क्षुब्ध हो कर विस्फोट की सारी प्रविष्टियाँ उड़ा दीं।

 

कुल मिला के बात यह हुई -

 

एक निजी संकलक के सञ्चालक को अज्ञात कारणों से एक चिट्ठे के लेख पसंद नहीं आए, या शायद लेख पसंद नहीं आए। या कारण शायद कुछ और हो। या शायद कोई कारण न हो। निजी है भई। पर कारण है अज्ञात। इस वजह से निजी संकलक ने चिट्ठा अपने यहा से हटा दिया।

 

इस घटना पर एक और लेखक ने टीका टिप्पणी की। कुछ समय बाद इसी लेखक ने भी अपना लेख उड़ा दिया। पहले लिखा, और फिर उड़ा दिया। बिना कारण बताए।

 

इस सब से त्रस्त चिट्ठा सञ्चालक ने अपना चिट्ठा उड़ा दिया।

 

समझ नहीं आता है कि जब निजी संकलक वालों ने कह ही दिया है कि उनका सङ्कलक निजी, स्वान्तः सुखाय है, सर्वव्यापी नहीं है, वसुधैव कुटुम्बकम् नहीं है,  तो उनसे कोई उम्मीद क्यों? इतना निश्चित है कि अगर निजी संकलक के सञ्चालक की पसन्द के लेख, उनकी पसन्द के लेखक वापस विस्फोट पर आ जाएँ तो विस्फोट वहाँ दुबारा आ जाएगा।

 

लेकिन यह हाल तब है जब तीन और संकलकों पर विस्फोट लगातार छप रहा था। चार में से तीन संकलकों पर विस्फोट छप रहा था, और मुझे विश्वास है कि यदि सञ्जय जी अपने चिट्ठे के आँकड़े देखते तो वह पाते कि कई लोग विस्फोट पर सीधे आते हैं, संकलकों के जरिए नहीं।

 

सोचिए यह हाल है हमारे अग्रणी लेखकों का तो शुरुआती दौर से गुज़र रहे लेखकों का क्या हाल होता होगा? वह लोग कितने चिट्ठे बनाते होंगे और प्रोत्साहन न मिलने पर छोड़ देते होंगे, मिटा देते होंगे?

 

सञ्जय जी ने एक भी बार नहीं सोचा कि और संकलक - नारद, हिन्दी ब्लॉग्स और मेरे द्वारा सञ्चालित चिट्ठाजगत – मरे नहीं हैं। निष्पक्ष हैं। व्यक्तिगत खुन्न्स के लिए प्रविष्टियों में बदलाव नहीं करते। प्रविष्टियों के क्रमाङ्कन में हेर फेर नहीं करते। कड़वी दवा पिलाने वाले चिट्ठों को गायब नहीं करते। निजी नहीं हैं, अपनी सार्वजनिक ज़िम्मेदारी मानते हैं और समझते हैं।

 

आप संकलकों के ग्राहक हैं, संकलक कुछ गलत करते हैं तो आप उसके बारे में आवाज़ उठाने से डरते क्यों हैं? उनके विकल्पों को चुनने से क्यों डरते हैं? पूर्णतः संकलक मुक्त क्यों नहीं हो जाते?  उनके सामने घुटने क्यों टेकते हैं? निजी संकलकों के विकल्पों को प्रचारित क्यों नहीं करते?

 

आप सोच रहे होंगे कि यह देखो निजी संकलक का प्रतिद्वन्द्वी लोहा गरम देख के वार कर रहा है।  प्रतिद्वन्द्विता है भई, बिल्कुल है, पर उसका फ़ायदा तो पाठक और लेखक को होना चाहिए ? वह क्यों नहीं हो रहा?  और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

आप लोग क्यों एक ही निजी संकलक को भगवान बनाए बैठे हैं? क्यों उसे चने की झाड़ पर चढ़ाए बैठे हैं? रवि रतलामी जी कहते हैं कि अच्छा लिखने वाले को किसी संकलक की ज़रूरत ही नहीं है।

 

उससे एक कदम आगे जा के मैं यह कहता हूँ कि इस प्रकार की करतूतों को सामने लाना ज़रूरी है, बिना इस बात से डरे कि मैं सङ्कलक की बुराई करूँगा तो मेरे चिट्ठे का क्या होगा। अगर मेरे इस लेख की वजह से नौ-दो-ग्यारह, किसी निजी संकलक से नौ दो ग्यारह हो जाता है, तो हो जाए। मैंने चिट्ठा लिखना जब शुरू किया था तो संकलक का कहीं नामोनिशान नहीं था। मुझे नहीं लगता कि एक निजी संकलक से मेरा लेख हट जाएगा तो मेरा चिट्ठा लिखना बेकार हो जाएगा।

 

फ़ुरसतिया जी कह चुके हैं, चिट्ठा ही नहीं रहेगा तो संकलक क्या करेगा?

 

ज्ञान जी कह चुके हैं, मैं संकलकों में प्रतिद्वन्द्विता का अनुमोदन करता हूँ, क्योंकि इससे गुणवत्ता बढ़ेगी।

 

पर ऐसा लगता तो नहीं। इसका ज़िम्मेदार कौन है? क्या संकलक वाले हैं? या उनके पाठक? या लेखक?

 

 आपको क्यों लगता है कि किसी के निजी संकलक पर आपका लेख नहीं छपेगा तो आपका लेख लिखना बेकार है? यही सवाल है आपका जिसका जवाब मैं आपसे टिप्पणियों में चाहता हूँ।

 

ध्यान दें, मैं किसी टिप्पणी को मिटाता नहीं हूँ, और न ही बेनामी टिप्पणियाँ खुद करता हूँ। जो लिख रहे हैं, सोच समझ के लिखें, वह मिटेगा नहीं।

 

हाँ इस बहाने बतङ्गड़ जी की प्रतापगढ़ वाले धारावाहिक वृत्तान्त पढ़े, बहुत बढ़िया लगे, आप भी पढ़िएगा

 

 

सवाल दोबारा –

 

1.       क्या आपको लगता है कि आपका लेख किसी के निजी संकलक पर नहीं छपेगा तो आपका लिखना बेकार है?

2.       क्या दूसरे सङ्कलक, यानी नारद, हिन्दी ब्लॉग्स, और चिट्ठाजगत इतने गए गुज़रे हैं कि उन्हें बन्द हो जाना चाहिए?

3.       आप विस्फोट के सञ्चालक होते तो इस स्थिति में क्या करते? या दूसरे शब्दों में, यदि आपके साथिया या निजी चिट्ठे के साथ ऐसा होता तो आप क्या करते?

 

जवाब दीजिए, आप जवाबदेह हैं। कृपया निजी संकलकों की सम्पादकीय नीति की चर्चा अन्यत्र करें, स्वान्तः सुखाय नीति की चर्चा के लिए यह लेख नहीं है, केवल उपरोक्त तीन सवालों का जवाब माँगने के लिए है।

16 टिप्‍पणियां:

  1. विस्फ़ोट से लेख हटाने की कोई आवश्यकता नहीं थी… किसी एक एग्रीगेटर पर दुनिया समाप्त नहीं हो जाती, और अच्छे लेख तो पढ़े ही जायेंगे, और शायद विस्फ़ोट का तो खुद का डोमेन भी है, फ़िर क्या चिंता है…

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  2. क्या तिवारीजी ने विस्फोट को मिटा दिया?!!!


    मुझे घोर आश्चर्य हो रहा है, कम से कम उनकी छवि जो मेरे मन में थी, यह कार्य उसके अनुकुल तो कतई नहीं. मेरे हिसाब से तो उन्हे पुछना था की काहे हटाया? फिर लिखना जारी रखते की हटाया तो मेरी बला से....


    दुसरी ओर कोई अपने चिट्ठे पर कब, क्या, क्यों, कैसा लिखता है यह चिट्ठे मालिक पर है, वही उत्तरदायी है. ठीक उसी प्रकार एग्रीगेटर संचालक पर है की वह क्या दिखाये, क्या न दिखाये. आपके पास विकल्प है, फिर परेशान होने की क्या बात है? सबकी अपनी अपनी नीतियाँ है.

    अब आप द्वारा पूछे गये सवालों पर..


    मेरा लिखना कतई बेकार नहीं चाहे कोई दिखाये या न दिखाये.

    कोई साइट क्यों बन्द हो, भाई? सभी मस्त है, खुब चल रहे है.

    विस्फोट हमारा होता तो अभी जीवित होता.

    यहाँ यह भी बताना चाहुँगा की मुझे इस मामले की कोई जानकारी नहीं, आपके चिट्ठे पर ही पढ़ा है.

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  3. फीड एग्रेगेटर अगर मॉडरेशन करता है तो वह सर्वजनहिताय घोषित पॉलिसी के तहद होना चाहिये। मनमानी फिडलिंग के लिये नहीं।
    बाकी विस्फोट विस्फोट करे या स्वयम विखण्डित हो - वह उसकी अपनी मर्जी है।
    मोनोपोली किसी भी क्षेत्र में खराब है।
    हिन्दी पाठक/ब्लॉगर को फीड लेना और उसे ऑनलाइन/ऑफलाइन पढ़ने के लिये स्वयम को शिक्षित बनाना चाहिये!

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  4. "मरे नहीं हैं। " bhagwaan umr sabkii lambii karey aalok !!!!!!!
    आपको क्यों लगता है कि किसी के निजी संकलक पर आपका लेख नहीं छपेगा तो आपका लेख लिखना बेकार है? यही सवाल है आपका जिसका जवाब मैं आपसे टिप्पणियों में चाहता हूँ।
    i write because it gives me happiness to write
    i write because its my way of giving my thoughts back to my society . aggregators have a role in promoting my blog but even if they dont it does not matter aalok
    sanjya should not have deleted the blog but like they in every an there is a child most hindi bloggers are still child , may be because blogging is in its "kid " stage .
    we fight over language , we fight over spellings we fight as if blogging is a prestige issue
    i will write because i want to write and blogging has given me a page to write

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  5. Jagdish Bhatia1:29 pm

    1. पाठक सर्च इंजन से आते हैं, एग्रीगेटर पर पोस्ट दो घंटे में अगले पन्ने पर चली जाती है।

    2. कौन बंद होगा कौन चलता रहेगा यह इतिहास ही बतायेगा। नकरात्मक सोच अधिक दिन नहीं चलेगी।

    3. मस्त रहते।

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  6. ब्लोगिंग एक स्वतंत्र विधा है किसी के हटाने से या मिटाने से यह खत्म नही हो सकती है जिसने पढ़ना है वह पढ़ ही लेगा कैसे भी .सो मेरे ख्याल से जो भी दिल में आए वह लिखिए और पोस्ट कर दे ..जिसने बाकी जो करना है वह उसकी सोच है और उस पर किसी का जोर नही हैं ..

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  7. बेनामी3:35 pm

    Roman mein hindi ke liye kshama. Visfot band ho gaya sun kar dukh hua. Ye aisa blog tha jis par main roj seedhe jata tha bina kisi aggregaator ke. Maine ise apne 'Favourites' mein dal rakha tha. Is par jo lekh hote the vo jankari to akhbaar padhkar bhi nahin milti thi. Khass kar mere jaise log jo hindustan se bahar hain un ke liye ye bahut hi achhe aur gyan vardhak the. Sanjay ji ko use shuru karne ke barey mein fir se sochna chahiye. Ummeed karta hoon ki unhone sab kuch delete karne se pehley backup kiya hoga taki amulya gyan nasht na ho.
    Sanjay ji ko aggregator se vyaktigat khunnas ho sakti hai par jo jankari vo logon ko de rahe hain kya vo kartvay vyaktigat bhavnaon se upar nahin hain.
    isliye unhe vyaktigat karnon se aisa nahin karna chahiye.

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  8. ब्लॉग को डिलीट कर देना बहुत दुखद बात है. एग्रीगेटर के साथ क्या बातें हैं, वो एक अलग मुद्दा है लेकिन ब्लॉग को डिलीट कर देना वाकई दुर्भाग्यजनक है. मेरा मानना है कि कोई भी चिट्ठाकार किसी भी परिस्थिति में कम से कम ब्लॉग डिलीट करने जैसा कदम न उठाये.

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  9. असहमति के बिन्दुओं की प्रतिक्रिया बहुत नकारात्मक रही.
    - ब्लॉग का संकलक पर न आना उसके लेखन की नकार नहीं है.हाँ, बुरा लगना स्वाभाविक है कि उसी का बहिष्कार क्यों किया जा रहा है.
    - ऐसा कतई नहीं है कि अन्य संकलक गए गुजरे हैं. बल्कि कई मायनों में विशिष्ट हैं- वहाँ लोगों को अपने अहम् पोसने व टी आर पी टाईप पब्लिसिटी का अवसर न था,( हाँ, वैसे गत आठ दस दिन से अब चिट्ठाजगत भी कहीं उसी प्रकार की लालसा को पोसने कि दिशा में जाता दिखाई दिया है. पहली बार को जिसे देख कर लगा था कि यह भी ब्लॉग धारियों को प्रश्रय देने की नीति का लाभ लेने कि दिशा में तो नहीं चल पडा.)
    -- मैं यदि विस्फोट जैसा जनप्रियचिट्ठा - धारी होती तो ऐसा नहीं ही करती, बल्कि मैं तो इस से एक कदम और आगे का पूरा सच कहूँ तो -- मैं तो आज ही की तरह नॉन - जनप्रिय चिट्ठे चलाने के बावजूद किसी की पसंद नापसंद के कारण अपना ब्लॉग किसी भी कीमत पर बंद न करूँ. जिन्हें मेरे लिखे - बनाए से कष्ट हो वे न पढ़ें, न टीपें ( जैसा कि सामान्यत: अभी भी है). क्योंकि भई आयुर्वेद के अनुसार पेचिश व कब्ज होने के कारण केवल आहार में त्रुटि ही नहीं होते बल्कि अपना संस्थान व प्रणाली(system) भी तो होता है.
    अब अपना system और पाचनक्रिया लोगों को आप ही तो देखनी होगी न.संजय जी बेकार अपने को दंड दे रहे हैं.

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  10. i think ranjuji n rachna ji have a valid point n i stand by them.

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  11. ब्‍लॉगवाणी ने विस्फोट की फीड लेना क्‍यो बंद किया, ये तो ब्‍लॉगवाणी के संचालक ही बता पाएंगे। हम सिर्फ कयास लगा सकते हैं और उनकी लानत-मलामत कर सकते हैं। मुझे लगता है कि संकलक को किसी चिट्ठे की फीड को अलग करने के फ़ैसले को सार्वजनिक करना चाहिए। इसके लिए एग्रीगेटर पर अलग से एक बॉक्‍स होना चाहिए। उसमें ये सूचना हो कि इस महीने या हफ्ते किस ब्‍लॉग को जोड़ा गया और किस ब्‍लॉग को हटाया गया, क्‍यों हटाया गया।

    दूसरी बात, संजय तिवारी ने विस्‍फोट का पटाक्षेप करके एक अपराध किया है, जो अक्षम्‍य है। अगर वो दस दिन पहले ऐसा करते, तो वे अपराधी नहीं होते। तब विस्‍फोट उनका निजी ब्‍लॉग था - लेकिन जब उन्‍होंने विस्‍फोट को कम्‍युनिटी के हवाले किया - तो वो कम्‍युनिटी का था। संजय जी ने वहां से एडसेंस का मसला हटा कर एक संदेश देने की भी कोशिश की - लेकिन आज जब निजी फ़ैसले पर उन्‍होंने विस्‍फोट को दबा दिया है, तो उनका वो संदेश (और विवेक) मुझे तो नाटक लग रहा है।

    आलोक जी, आपने एक अच्‍छी बहस शुरू की है, लेकिन इसकी शक्‍ल एक एग्रीगेटर को निशाना बनाने जैसी लग रही है। आप एक विनम्र इंसान हैं और ऐसे हमले आपके तथ्‍य और तर्क, दोनों को ही कमज़ोर करेंगे।

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  12. क्या कहें कुछ मज़ा नही आया :) वैसे मुझे घटना क्रम भी ठीक से नही पता :(

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  13. अविनाश जी, टिप्पणी करने का धन्यवाद। आपकी टिप्पणी बहुत जायज़ है। पर जैसा कि अगली टिप्पणी बताती है, कई लोगों को पता ही नहीं है कि वास्तव में हुआ क्या है। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि सञ्जय जी और ब्लॉगवाणी वाले स्वयं बताएँ कि वास्तव में हुआ क्या है।

    पर यदि वे नहीं बताएँगे तो क्या कोई पूछे भी नहीं, सच सामने न आए?

    जो कुछ एक व्यक्ति के साथ आज हुआ है वह औरों के साथ कल हो सकता है। जब तक हमारे साथ न हो हम इन्तज़ार करें?

    जब बाज़ार नारद से हटा था तो सबसे प्रखर आवाज़ आपकी ही थी। क्या वह जायज़ थी क्योंकि आप किसी संकलक के संचालक नहीं थे, और यह आवाज़ नाजायज़? मैंने स्पष्ट किया है कि मैं प्रतिद्वन्द्वी संकलक का संचालक हूँ, ताकि लोग तदनुसार, इसे मद्देनज़र रखते हुए राय बना सकें। साथ ही जैसा आपसे फ़ोन पर कहा, मैं एक लेखक और पाठक - विस्फोट का - भी हूँ।

    इस मामले की तह तक जाना निश्चित रूप से आवश्यक है। सामाजिक गतिविधि में लगी संस्था जवाबदे है, भले ही वह काम स्वान्तः सुखाय ही क्यों न कर रही हो। यदि नहीं होगी, तो वह लोकैषणा की इच्छा भी न करे, आलोचना के लिए भी तैयार रहे।

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  14. अभी तक तो सतह के ऊपर का 1/9 हिस्सा ही दिख पाया है, बाकी 8/9 हिस्सा जानने पर ही कुछ कहा जा सकता है। संजय और मैथिली जी दोनों ही मेरी नज़र में बहुत संयत, कर्मठ और गंभीर लोग हैं। खैर, आपने बेहद संजीदा मसले को उठाया है। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

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  15. बेनामी10:47 am

    itna ho halla ho gaya
    par abhi bhi visfot blog chal raha hai
    bina aadhar ke he aap log itni lambi bahas kar dale
    jai ho prabhu
    :-)
    CHK IT
    http://visfot.wordpress.com/

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  16. बेनामी10:06 am

    मुझे तो लगता है की ये Visfot.com की मार्केटिंग है .पहले visfot.blogspot.com को community ब्लॉग बनाया फिर पंगा लेकर delete कर दिया और visfot.com का लिंक डाला हुआ है ताकि visfot.blogspot.com के visitor visfot.com पर जानए.

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