15.11.09

सेब पर मलयालम

पहले कुछ इतिहास। सेब का इस्तेमाल करने वालों को अमूमन बंगाली, मलयालम, कन्नड़ अक्षरों के बजाय डब्बे ही दिखते हैं - कम से कम सेब १०.४ तक तो। आइए देखते हैं मुद्रलिपियों का कुछ इतिहास -

  1. मुद्रलिपियों की दुनिया में ट्रू-टाइप (टीटीऍफ़) का विकास सेब वालों ने किया था। इसे इस्तेमाल करने की इजाज़त माइक्रोसॉफ़्ट - विंडोज़ वालों - ने भी सेब वालों से ली।
  2. टाइप १ (पोस्ट स्क्रिप्ट) प्रारूप की मुद्रलिपियों का विकास अडोब बालों ने किया (वही पीडीएफ़ पाठक वाले)।
लेकिन सभी लिपियों के लिए उन्नत प्रदर्शन - खासतौर पर अरबी और भारतीय भाषाओं की लिपियों के लिए - ट्रूटाइप और पोस्ट स्क्रिप्ट पर्याप्त नहीं थे - टूटी मात्राओं वाली पुरानी मुद्रलिपियों से तो हम वाकिफ़ हैं ही। अतः कुछ समय बाद माइक्रोसॉफ़्ट ने सेब वालों की नई तकनीक - जीएक्स टाइपोग्राफ़ी - में साझेदारी करने की कोशिश की - लेकिन बातचीत ने सफल होने से पहले ही दम तोड़ दिया।
नतीजा यह हुआ कि माइक्रोसॉफ़्ट और अडोब ने पहले अलग अलग और फिर मिल के अपनी तकनीक को प्रोत्साहन दिया, उसे ट्रूटाइप ओपन - या ओपन टाइप कहा जाता था। आज की तारीख में आप जो रघु, मंगल, संस्कृत २००३, सुरेख आदि मुद्रलिपियों का इस्तेमाल करते हैं वे ओपन टाइप ही हैं। ये या तो .टीटीएफ़ होती हैं या .ओटीएफ़।
कुछ समय बाद माइक्रोसॉफ़्ट और अडोब ने ओपन टाइप को खुला मानक बनाने की पहल की - यानी केवल वे दो ही नहीं अपितु कोई भी उस मानक के आधार पर मुद्रलिपि बना सकता है और मान के आधार पर कोई भी संगठन मुद्रलिपि पर सही की मोहर लगा सकता है - इसके लिए केवल इन दो कंपनियों का मोहताज रहने की ज़रूरत नहीं।
नतीजा यह कि ओपनटाइप मुद्रलिपियों की बाढ़ सी आ गई। ध्यान दें कि केवल देवनागरी ही नहीं बल्कि रोमन में भी कई बेहतर किस्म के संयुक्ताक्षर - जैसे कि हस्तलेखन वाली मुद्रलिपियाँ - ओपनटाइप के जरिए बनाई जा सकती हैं।
लेकिन अब सेब वाले कहाँ रह गए? भई उनकी तकनीक तो उन्नत थी ही - शायद अब भी ओपनटाइप से बेहतर हो - जीएक्स टाइपोग्राफ़ी - जिसकी मालिकियत सेब के पास थी - अब तक एएटी - एप्पल एड्वांस्ड टाइपोग्राफ़ी - बन चुकी थी, और यह भी देवनागरी, अरबी संयुक्ताक्षर आदि प्रदर्शित करने की क्षमता रखती थी -लेकिन अब दो "मानक" हो गए - एक सेब का अपना - जो सिर्फ़ सेब पर ही चलता - और दूसरा ओपन टाइप - जिसका मुक्त मानक था, यह विंडोज़, लिनक्स आदि पर बखूबी चल रहा था।
यानी, जब तक आपके पास सेब के लिए एएटी वाली मुद्रलिपि न हो आपको देवनागरी/अरबी /मलयालम ठीक से नहीं दिखेगी।
इतिहास का पाठ समाप्त हुआ, अब वर्तमान में आते हैं।

अब अगर आपकी न सेब में दिलचस्पी हो और न ही मलयालम में फिर भी यह जानकारी काम की है।

काम की इसलिए कि मॅकमलयालम वालों ने विंडोज़लिनक्स पर चलने वाली ओपनटाइप मुद्रलिपियों को सेब पर चलाने के लिए परिवर्तित करने में सफलता पाई है।

इसीलिए तो लिनक्स और विंडोज़ वाली मलयालम मुद्रलिपियों में से एक, रचना मलयालम, अब सेब की आत्सुई (एटीएसयूई) - ऍप्प्ल टाइपोग्राफ़ी सर्विसेज़ फॉर यूनिकोड इमेजिंग में भी उपलब्ध है।

अर्थात् सरल शब्दों में - देवनागरी की यूनिकोडित मुद्रलिपियों को सेब में इस्तेमाल करने के लिए रास्ता साफ़ है। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।

अगर आपके पास सेब है और मलयालम में भी दिलचस्पी है तो मॅकमलयालम का आनंद उठाएँ। अगर आप अपने विचरक की मलयालम जाँचना चाहें तो विकिपीडिया या ट्विटर के मलयालम हिस्सों को देख कर जाँचें।

कुछ भविष्य के बारे में।

सेब वाले भी अब धीरे धीरे ओपनटाइप को अपना रहे हैं। सेब १०.५ में अरबी प्रदर्शन के लिए ओपन टाइप मुद्रलिपियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। संभव है कि सेब वाले कुछ मामलों में सीधे ओपन टाइप का ही इस्तेमाल करना पसंद करें - क्योंकि यह अब पका पकाया माल है, और इतनी सारी मुद्रलिपियाँ ओपन टाइप की पहले ही हैं।

दूसरी बात यह - जो वर्तमान के संदर्भ में कही - ओपन टाइप मुद्रलिपियों को एएटी में परिवर्तित करने का मार्ग प्रशस्त है - जैसे कि इस मलयालम मुद्रलिपि में। इसका भी लाभ सेब के प्रयोक्ता उठा पाएँगे।

सीख यह - उन्नत तकनीक पैदा करो, और फिर सही समय तक कमाई करने के बाद - दुह लेने के बाद उसे मानक बनने के लिए खुला छोड़ दो। नहीं छोड़ोगे तो कोई और बाजी मार ले सकता है। हमारी भारत सरकार ने इस्की के जरिए एक-बाइटीय उन्नत मुद्रलिपियाँ तो पैदा कीं, लेकिन उसे मुक्त मानक न बनाया - इससे भारतीय भाषाओं का संगणन आराम से १०-१५ साल पीछे हो गया - जब तक यूनिकोड न आया तब तक हमें अपने बिल में छिपा ही रहना पड़ा - पर चुगे हुए खेत का रोना न रोते हुए हम नौ दो ग्यारह होते हैं।

5 टिप्‍पणियां:

  1. हमारी रूचि सेव में नही है ..फिर भी देख लेंगे.

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  2. "अर्थात् सरल शब्दों में - देवनागरी की यूनिकोडित मुद्रलिपियों को सेब में इस्तेमाल करने के लिए रास्ता साफ़ है।"

    'नौ दो ग्यारह' होने के पहले इस पर और प्रकाश डालना चाहिये था। खैर, अब भी समय है।

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  3. अनुनाद जी टिप्पणी करने का धन्यवाद।

    थोड़ा और प्रकाश डाला है - भूत और भविष्य के बारे में - आशा है लाभदायक होगा।

    यदि कोई ऐतिहासिक तथ्य गलत हो तो कृपया ज्ञानीजन इंगित करें, आभारी होऊँगा।

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  4. बहुत अच्छी जानकारी दी गुरुजी। आपको पता ही है कि इस तरह की जानकारियों में मेरी बहुत रुचि है। इण्टरनेट पर हिन्दी के पुराने उपयोक्ता होने के कारण आपके पास इस तरह की बहुत जानकारियाँ हैं उन्हे साझा करते रहा करें। यदि हो सके तो सेब पर हिन्दी बारे विस्तार से जानकारी दें। इस पोस्ट में दी गई जानकारी को विकिपीडिया पर भी डाल दें अथवा मुझे इसके लिए अनुमति प्रदान करें।

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  5. ई जी, विकिपीडिया से ही उठाई है यह जानकारी - अधिकतर :) सो अनुमति तो है ही।

    वैसे आप कभी आप अपनी राजधानी चंडीगढ़ की तरफ़ आएँ तो सेब पर हिंदी खुद ही देख लें, हाथ कीबोर्ड को स्क्रीनशॉट क्या! वैसे लिखता रहूँगा।

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