3.7.06

व्याकरण और हिज्जे

कई लोगों की प्रविष्टियाँ पढ़ के कर लगा कि अरे दइया, मैं लिखने में इतनी ग़लतियाँ करता हूँ। शायद किसीने किसी ने टोका होता तो मैं इन्हें सुधार भी लेता। सो आज से मीन मेख अभियान शुरू किया है, दूसरों के लिखे में ग़लतियाँ निकालने का, इस उम्मीद में कि लोग यही कड़वी दवा मुझे भी पिलाने को अग्रसर होंगे। अब होते हैं नौ दो ग्यारह, हमें है अब दफ़्तर जाना।