31.1.06

देशभक्ति 2.0 बेटा

रंग दे बसंती देख ली, देशभक्ति का नया उद्धरण है, पुरानी वाली और नई वाली के बीच टाँका भिड़ाने का सफल प्रयास । क्या कहने। कई दिनों से नौ दो ग्यारह था। इस दुनिया में दिन सालों के बराबर होते हैं, ऐसा देबाशीष ने कहा था। मुझे भी वही महसूस हो रहा है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. Ab aa gaye hain to angad ke paon ki tarah jam ke rahiyega :)

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  2. हाँ और आलसी लोगों की भी खूब खबर लूँगा ।

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  3. बेनामी8:38 pm

    alokji

    taanka bhidane jaisa shabd prayog karke aapne deshbhakti ko occha bana diya. Aajkal hum log to sadkon par kaagaz phenkane aur thukne se bhi baaj nahi aate hai to is par to kisi ka rang de basanti bananaaur uske baare mein sochna bhi deshbhakti hi kaha jayega. Maana ki aap achcha likhte hai iska matlab yeh nahi ki galat salat sarcastic remarks likh kar logo ka dhyan aakarshit karen.
    Agar aap ko deshbahakto aur filmo se nafrat hai to kripya america jaakar rahe. Vahan pe cheese aur cola ke combination se shayad american bhakti jaag uthe.
    Desh ke liye jin logo ne socha woh bhi pujyaneeya hai isliye aap apne sarcastic aalochana ka daaya apni soch tak hi seemit rakhe.

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  4. anonymous जी,
    बड़ी धुआँदार कलम है आपकी। आप हिन्दी में लिखें तो मज़ा आए। जी हाँ, कोक व चीज़ को तो मैं झेल चुका हूँ, पर मेरा अर्ज़ यह है कि आप दर्जी के काम को इतना निकृष्ट क्यों मानें! आख़िर टाँका भिड़ाना भी तो एक विशिष्ट कला है जो कि हर किसी के बस की नहीं है।

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