18.1.04

कही अनकही

शुक्रवार १६ जनवरी, २००४ को यह चिट्ठा, हिन्दी का इकलौता चिट्ठा नहीं रहा। शोक में दो मिनट मौन रखा जाए और बाकी २३:५८ घण्टे जश्न मनाया जाए, क्योंकि मिल ही गया आख़िरकार, हिन्दी का एक और चिट्ठा। मुबारक हो, पद्मजा जी। बस, अब तो जङ्गल में आग पकड़ने की ही देर है।

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