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13.12.08

प्रतिलिपि

एक तो वैसे ही अगर कोई .इन डोमेन पर अपना माल चढ़ाता है तो दिल खुश हो जाता है, ऊपर से इतनी मेहनत से द्विभाषीय पत्रिका निकाली है प्रतिलिपि.इन वालों ने तो क्या कहने।

भइया आखिर द्विमासिक, द्विभाषी पत्रिका है कोई मज़ाक थोड़ी है। और प्रिंट ऑन डिमांड पर। अप्रैल, जून, अगस्त, अक्तूबर के बाद अब यह दिसंबर २००८ का अंक है। सबसे अच्छा तो इसका साज सज्जा लगा - वर्डप्रेस वाकई बढ़िया है। हाँ नाम थोड़ा फ़ैबिंडियाई है पर पढ़िए।

6.12.07

खाओ गगन, रहो मगन!

पर यह खाने वाला नहीं है, पढ़ने वाला है। वैसे गगन वनस्पति गायब कहाँ हो गया? [गायब या ग़ायब?] चन्द्रशेखर आज़ाद का इत्ता बड़ा काव्य संग्रह - बाप रे बाप। और ज़रूर हाइकु बाज़ों को यह विश्व का पहला भी पसंद आएगा। मगर सबसे बढ़िया चीज़ है बाल साहित्य। आज शाम को पढ़ता हूँ यह गगन।